गुरुवार, 3 जून 2021

 वो वृद्ध महिला

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एक बच्चा मोबाइल पर कुछ वीडिओज़ शायद कार्टून या अन्य टाइम पास चीजें देख रहा था । एक बड़ा लड़का उसे दिखा रहा था । पास में एक बूढ़ी बैठी है । अत्यंत वृद्धा । वो छोटा बच्चा उस बूढ़ी महिला के बड़े बेटे का पोता है । छोटे बच्चे के टीशर्ट पर स्पीडरमैन लिखा है । और वो बृद्ध महिला पीली साड़ी पहनी है हालांकि वो विधवा है । जो है उसका इस दुनिया में केवल बेटे पोते ।
कुछ माह पूर्व सिन कुछ अलग था । पहले वृद्ध महिला बड़े बेटे के पास रहती थी , अब अपने छोटे
बेटे के पास रहती है । कारण जो हो पर , बड़े बेटे के लड़के की शादी हो गई है और जो लड़की दुल्हन बनकर आई है उसकी चारों ओर खूब चर्चा है । और माँ को जब बेटे ने अपने पास रखने से इनकार किया तो इस बात की भी चर्चा हुई ।
पर उस बूढ़ी महिला को देखकर नहीं लगता कि वो किसी से द्वेष करती है । वो शायद सोचती होगी "सब तो अपने ही हैं किससे लड़ें । और किसको अपनी शिकायत करें । चलो खुद ही कष्ट सह लेती हूँ । एक दिन मैं भी व्याह कर आई थी , मेरे मालिक थे , हम थे । फिर सारा परिवार बढ़ा हम दोनों से ही । पाला पोसा पर अब कहाँ किसी को याद रहता है । वो बस अपना फायदा-फायदा बकता रहता है । रिश्ता और संबंध भी अब फायदे देख ही निभाये जा रहे हैं । सब कुछ सबको मैंने दिया और मुझे ही बेदखल कर दे रहे हैं । क्या आज का हृदय संवेदना शून्य होता जा रहा ।"
वो बूढ़ी शायद इन्ही सब बातों को सोचते विचारते अपना बचा हुआ दिन काट रही हो ।
बूढ़ी कहती है, उस लड़के से जो बच्चे को मोबाइल पर वीडियो दिखा रहा है । "अरे बेटा इसमें राम जी सीता मैया नाय दिखायी देता है । लगा दो हम भी देखेंगे वो हनुमानजी वाला , हमरा पोतवा भी देखेंगे । "
सोचता हूँ, दो पीढ़ी निकल गई, अब तीसरी पीढ़ी आई है । क्या हमारे देश भारत में संस्कार के उच्च आदर्शों की कमी है या स्पाइडर मेन में जो बात है वो हनुमानजी में नहीं । कहाँ कमी रह जाती है । उस बृद्ध महिला के बेटे को क्या राम कथा नहीं मालूम होगा । या उसके पोते ने रामायण सीरियल कभी ना देखा होगा । या ये तीसरी पीढ़ी जो अन्य चीजें देख रही उससे क्या और उम्मीद की जा सकती है । कल वो भी तो अपने पिता को किसी वृद्ध आश्रम में या कहीं अकेला छोड़ दे सकता है ।
ऐसी स्थिति में किसका हाथ है, वृद्ध महिला का, युवा का, वीडियो का या समाज का ।

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 दीवारों की दुनिया ।

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एक राजकुमारी थी । अपने राजा पिता की एकमात्र संतान । माँ बचपन में ही चल बसी थी । राजकुमारी बड़ी हुई । राजा भी वृद्ध हो चला था । अतः उसने सोचा मरने के पहले कुछ यादगार चीज बना कर जाऊं । सभा बुलाई गई । सबों ने एक से बढ़कर एक प्रस्ताव दिया । पर किसी का प्रस्ताव अच्छा नहीं लगा । एक दिन उसने एक सपना देखा कि वो एक बाग में है । और जहाँ रंग रंग के फूल खिले हैं । वह राजा अति प्रशन्न हुआ । कि उसके सपने में जो दिखाई दिया वो अगर सच में हो जाए तो बहुत अच्छा हों।
दूसरे दिन फिर सभा पुनः बुलाई गई । बाग लगाने का प्रस्ताव तो सबको अच्छा लगा पर ये तो कोई कह नहीं सकता कि कल ये पौधे जीवित रहेंगे या नहीं । उसकी सुरक्षा के लिए और उसकी विशेष पहचान के कारण एक जादूगर की मदद ली । उस राजा ने एक बाग लगवाया । जो कई जादूगरी विशेषताओं से लैस थी । बहुत दिन हुए । प्रसिद्धि फैली और चारों तरफ के दुश्मनों ने सोचा अगर वो बाग हमें प्राप्त हो जाए तो अच्छा होगा । लड़ाई छिड़ी । राजा मारा गया ।

अब राजकुमारी अकेली रहती है एक गुप्त जगह पर जहाँ की जानकारी किसी को भी नहीं । राजा ने इसी सुरक्षा के लिए उसे बनवाया था ।
वो राजकुमारी अकेले रहती । उसके साथ कोई नहीं था । वह जब अपने कमरे की दीवार को देखती तो उसके पूर्वजों की उसे तस्वीर दिखाई देती । कई बार उसके पूर्वज उसके सपने में आते । वे कहते कि हमें मुक्त कर दो । हमें मुक्त कर दो । मैं इस दीवार में अब नहीं रहना चाहता । कई बार वो सोचती रहती कि पूर्वजों के जो चलचित्र दिखाई देते है । वो ऐसा क्यों होता है । कई कई बार उसके जेहन में ये बात इसलिए आती हो कि वो इस भवन से बाहर जाना चाहती है । पर जा नहीं सकती ।
एक बार उसके कमरे में एक चिड़ियाँ घुस गई । चिड़ियाँ बहुत कोशिश करती बाहर जाने की पर नहीं जा पा रही थी । वह जितनी बार उड़ती छत से टकरा जाती । कभी पर्दे से वह उलझ जाती । खिड़की दिख नहीं रही थी उसे । बसे एक बार देखा भी तो रॉड की धारियां उसे निकलने नहीं देती । अगर निकलती तो उसके पंख कट जाते ।
चिड़िया के इस उलझन को देखकर उसे अपनी याद आने लगी ।
तभी चिड़ियाँ उस राजकुमारी से कहती है क्या तुम मुझे यहाँ से निकलने में मेरी मदद कर सकती हो । हाँ, कर सकती हूँ । इतना कहते ही ग्रिल और खिड़की दोनों खोल दी । वो चिड़िया बोली चलो तुम भी मेरे साथ । राजकुमारी बोली मैं अभी नहीं जा सकती ।
आज उसे फिर स्वप्न आया कि वो खुद घर की दीवार में चुन गई है । वह पत्थर में कैद नहीं होना
चाहती । जैसे ही वह यह बात बोली नींद टूटगई ।
वो सोचने लगी स्वप्न का संसार भी अजीब होता है । जो वास्तविक होने पर भी उसका कोई वजूद दिखाई नहीं पड़ता । पर उसे भाव अभी तक मन को आक्रांत किए हुए थे ।
वह सुबह भाग जाने का निर्णय की । और सुबह होने के पहले भाग गई । सबसे बचते हुए तो निकल गई पर वो ऐसे बाग में जा पहुंची जहां हरे घास के पौधे से दीवार बने हुए है । घास के गलीचे हैं । वो पहले से यहाँ खुश है । चारों तरफ हरियाली । फल फूल की कोई कमी नहीं । पर यहाँ रहते हुए उसे कई वर्ष हो गए । इससे भी वो ऊब गई । क्योंकि यहाँ कुछ भी नया नहीं होता । सब कुछ एक जैसा बना रहता । फूल खिलते हवा में हिलते डुलते पर कोई विशेष आकर्षण नहीं रह गया हो जैसे अब उसमें । वो सुबह से शाम तक खोजती रहती , भूख लगता फल तोड़ कर खा लेती । तितली के साथ खेलती । फिर थक कर सो जाता । फिर उठती तो उन्हीं दीवारों से खुद को घिरा पाती । ये कैसी दुनिया है जो खत्म ही नहीं होती । बहुत प्रयत्न कर थकहार कर बैठ गई । वो अब निर्णय करना चाहती है अब वो जिन्दगी भर यहीं रहेगी । इससे शायद बाहर जाने का रास्ता नहीं है । ठीक उसी समय उसे एक चिड़िया की आवाज सुनाई पड़ी । और उसे याद आया यहाँ रहते हुए इतने वर्ष हो गए पर एक भी चिड़ियाँ दिखाई नहीं पड़ी । अभी जो आवाज सुनाई पड़ी वो तो उसी पक्षी का लग रहा है जो वर्षों पहले मेरे महल के कमरे में फंस गई थी । आज फिर वही चिड़ियाँ उसे मिली पर वो घायल है । किसी तरह पत्तियों के रस से उसका उपचार करने पर जान बची । अब पक्षी बोली तुम यहाँ से कैसे आ फंसी । आजतक कोई नहीं यहाँ से जा पाया । यहाँ से निकलने का एक ही रास्ता है अगर तुम वो करोगी तो तुम निकल जाओगी । चिड़ियाँ के कहने पर वो आँख बंद की । बोली मैं जिस तरफ से आवाज दूंगी तुमको उधर ही चलते चलते आना है । बीच में आँख पर लगी पट्टी मत खोलना । और कुछ ही देर में किसी तरफ संतुलन बिठाते बिठाते वो ऐसी जगह पहुंच गई जहाँ बहुत सारे पक्षियों की आवाज सुनाई देने लगी । चिड़ियाँ के कहने पर वो अपने आँख पर लगी पट्टी खोलती है , वह खुद को पाती है कि ऐसे जगह आ गई जहाँ दूर दूर तक कोई दीवार नहीं हैं । यहाँ अब कुछ भी कृत्रिम नहीं । पेड़ पौधे पहले से कहीं ज्यादा खुश और जीवंत । दूर तक फैला समुद्र है , दूर पहाड़ों पर हरियाली दिख रही है । नीला आकाश । खूब सूरत बादलों की आकृति, सूरज की खुशनुमा धूप । सब कुछ कितना सुखद लग रहा पहले की तुलना में । वो पहले इतना बड़ा जगह देखी ही ना । आकाश की विशालता और सुदूर मैदानी इलाके से पहली वह खुशी से नाचने गाने लगी । इतनी खुशी पहले कभी नहीं हुई थी ।
रात हुई । पूर्णिमा की रात थी । आकाश में उड़ते बादलों और चांद की शीतल रोशनी को देखते देखते सो गई । वह स्वप्न देखती है कि वो चिड़ियाँ एक परी है वो उसे अपने परी लोक ले जा रही है । परी लोक से जब पृथ्वी पर झांकती है तो उसे लगता है वो जिस दुनिया से आई है वो तो दीवारों की दुनिया है । पूरी पृथ्वी भी एक अदृश्य दीवार से हवा से घिरी हुई है । और हर पल दृश्य बदल रहे है । सब कुछ जीवंत है पर सबकुछ बंधन में है । पृथ्वी पर होना ही है बंधन में पड़ना । वहाँ स्वतंत्रता है कहाँ । हर तरफ दीवार ही दीवार हैं । सबकुछ बंटा हुआ , बंधा हुआ है ।
अच्छा होता कि मैं भी यही रहूँ परी लोक में ही । राजकुमारी मन ही मन कहती है । परी बोली अभी तुम्हारा समय नहीं आया । जो दूसरों की सेवा में अपना जीवन दे देती है । वह स्वतः इस लोक में आ जाती है । तुम भी इंसानियत की बातों का पालन करोगी, दूसरों की मदद करो । तो तुम्हें भी मनचाहा पद ,जगह, सम्मान मिल जाएगा ।

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 फ्लैट नं०13

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"गली से ये कैसी आवाज आ रही है, रामू जरा खिड़की खोल कर देखना तो " मुरलीधर ने कहा ।
मुरलीधर दर्शनशास्त्र के रिटायर्ड प्रोफेसर हैं । जो एक कमरे के फ्लैट में अकेले रहते हैं ।
रामू चाय लाकर सामने टेबल पर अखबार के बगल में रखते हुए धीरे से कहा "लगता है आज उसने फिर पी लिया है सुबह सुबह"
रामू गली के तरफ की खिड़की खोल कर देखता है, फिर लगा देता है । दूसरे तरफ की खिड़की खुली है । सामने नीम का पेड़ है । जो पूरी तरह उसी फ्लैट की तरफ झुका हुआ है । प्रोफेसर जब भी उस खिड़की से बाहर की ओर देखते हैं, वही नीम का पेड़ उन्हें दिखाई देता ।
रामू के कहते ही सुबह सुबह, मुरलीधर अपनी कलाई में लगी घड़ी देखते हैं । सुबह के 8 बज कर 13 मिनट हो रहे हैं ।
"गौतम है सर, वही जिसका दो बिल्डिंग बाद घर है । और एक दो आदमी है जो उससे बहस कर रहे हैं " रामू ने कहा ।
मुरलीधर चाय का कप उठा कर कहते हैं," छोड़ो उसे, ये लोग कभी नहीं सुधरेगा; अपना तो शांति से रहता नहीं है दूसरों के जीने में भी खलल डालता है"
मुरलीधर चाय पीते हैं और बोलते हैं," इसमें वो सुगर फ्री नहीं डाले हो क्या"
रामू, "अभी देते हैं , भूल गए...भूल गए थे डालने ।
रामू " तुम अभी से भूलने लगे हो, हम बूढ़े हो गए मगर सब याद है "
रामू समझ गया कि अब इनका रेडियो ऑन हो गया अब इसे बंद करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है । आखिर दर्शन शास्त्र में भी कुछ है ।
मगर रामू करे भी तो क्या , ये तो उसका रोज का काम है । सुनाइए सुनाते रहिए, हम सब सुन लेंगे और इस कान से सुनेंगे और उस कान से निकाल भी देंगे ।
"रामू ! "
" हाँ सर"
"क्या बना रहे हो ।"
"कद्दू की सब्जी । "
"देखो ठीक से बनाना , उस दिन कद्दू कड़ा ही रह गया था । तुम जानते हो ,मेरा दांत । कड़ी चीज हमसे खाया ही नहीं जाता ।"
चाय की कप खाली कर रखते हुए मुरलीधर बोले ।
पेपर उठाते हुए रुके फिर, बोले, " एक जमाने में , गौतम बुद्ध हुए । उन्होंने जीवन को जैसे देखा । कोई आज तक देख सका है क्या । नाम से क्या होगा । गौतम , अभी भी कोलाहल शुरू ही है । गौतम बुद्ध जहाँ एक ओर शान्ति ध्यान और ज्ञान की बात करते थे । कौन सुना है उन्हें, कौन पढ़ता है उन्हें ।"
"कल रात, बगल में ही डीजे बज रहा था । कुछ कार्यक्रम होगा । तुम तो खाना पीना बना कर चले गए पर मैं रात भर सो नहीं सका । 2 बजे बाद तक नींद ही नहीं आई , फिर 3 बजे तो जागने का समय हो गया । ये डीजे डीजे क्या है, इतना लाऊड आवाज, आदमी को तो इससे हृदयाघात कभी भी हो सकता है । "
"सब पागल नाच रहे थे, अश्लील गानों पर । कहाँ जा रहा है । समाज, सोसाइटी । पढ़ा लिखा- अनपढ़ सब बराबर । ये तो हाल है, कैसी परंपरा चल पड़ी है क्या कहें "
रामू ठीक इसके विपरीत सोच रहा था और भीतर ही भीतर सब्जी की भांति तलभुज रहा था । मन ही मन कहता है, "क्या करे सब गौतम बुद्ध हो जाए, पत्नी को छोड़ के । जैसे आप छोड़ दिए हैं सबको । "
रामू सोचता है और कई बार तो कोशिश की उनसे उनके परिवार के बारे में पूछें । मगर कोई नहीं जानता ज्यादा उनके बारे में कुछ । बस सबको इतना ही पता है "वे दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर रह चुके हैं और फ्लैट नंबर 13 में रहते हैं ।"
रामू ने कहा, " क्या कीजिएगा सर, वो सबको बोल भी तो नहीं सकते हैं । बोलने पर तो वे सबके सब झगड़े पर ही उतारू हो जाते हैं । एक दिन एक लड़का हमसे कह रहा था, डीजे के बिना मेरा दिमाग का कम्प्रेसर काम ही नहीं करता ।"
अचानक दरवाजा पीटने की आवाज आती है । मुरलीधर डर जाते फिर संभल कर कहते हैं," कौन हो भाई, इतने जोर से । "
मुरलीधर जैसे ही गेट खोलते हैं, सामने 4- 5 पुलिस खड़ी है ।
"आप ही रहते हैं यहाँ" पुलिस ने कहा
डरते हुए मुरलीधर ने कहा " हां..."
पूरे घर की तलाशी लो, रामू आता है .
ये कौन है । सर , ये किचन घर का काम करता है ।फ्लैट में सभी पुलिस का प्रवेश । दोनों को बिठा कर पूछताछ करने लगा उस दल को लीड करने वाला । उधर अन्य पुलिस पूरे घर की तलाशी लेने लगे । इतने में पुलिस को फोन आता है, और बात करने पर तुरंत सबको आर्डर देता है , फ्लैट नंबर 18 , भागो । बचने ना पाए । हड़बड़ा कर सब भागते हैं । उतने में सब माजरा समझ आ जाता है । थोड़ी ही देर में पूरे एक गाड़ी विदेशी शराब जब्त की गई, दो अपराधी हथियार के साथ गिरफ्तार किए गए । साथ में गौतम को भी सड़क पर पकड़ कर लाया जा रहा है । उसी के यहाँ ये सब अवैध काम होता था ।
ये सब मुरलीधर उसी निम पेड़ वाली खिड़की से सब देख रहे थे । वो ये समझ नहीं पा रहे थे कि मेरा कोई ग्रह गोचर में तो प्रॉब्लम नहीं चल रही, या इस फ्लैट में कोई प्रॉब्लम है क्या । 3 माह हो गए और हर तीसरे या चौथे दिन कुछ न कुछ लफड़ा हो ही रहा है । या ये कॉलोनी ही वैसी है । मुझे तो शक इसका भी है ये पुराने से जर्जर मकान भी कब धरासायी हो जाए, कहा नहीं जा सकता । लगभग 70 - 80 साल तो हो ही गए होंगे मेरी तरह । हमारे पास भी अब टाइम कितना है कौन जानता है । कि कब मौत आए और गिरफ्तार कर मुझे लेकर चल पड़े ।

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 कहानी की कहानी - ( कहानी की जुबानी )

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एक बार एक जंगल में ख़रगोश और कछुए के बीच रेश हुआ । दोनों अपने अपने गति से भागने लगे, खरगोश लंबी लंबी छलांग लगता हुआ अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता गया । रास्ता लम्बा था । कछुआ उतना तेज तो नहीं भाग पा रहा था पर उसका इरादा पक्का था कि जीतूंगा तो मैं ही । दोपहर हुई, तेज धूप में दौड़ते दौड़ते खरगोश का गला सूखने लगा और उछलते उछलते पैर में दर्द होने लगी थी । कारण ऐसी दौड़ पहली बार हो रही थी, बड़ा जी जान से दौड़ा था, पर अब पानी पीना जरूरी था । थोड़ी दूर पर पानी दिखा ,उसने पानी पी कर जब दूर से देखता है तो उसे वो कछुआ अभी बहुत दूर दिखाई पड़ा । वो आ भी रहा है या नहीं उसे संदेह हुआ । और उसे लगा अब हम इतनी दूर आ ही गए है तो थोड़ा विश्राम कर लें, अब मंजिल 10 कदम ही तो बचा है । उसे नींद आ गई ।
और फिर जंगल के अन्य जानवर जो पूरी प्रतियोगिता को देख रहे थे उन्होंने देखा कि अभी 3 बज चुके हैं पर खरगोश का पता नहीं । कछुआ तो लकीर के एकदम करीब आने को है मगर खरगोश दिख नहीं रहा । बस पांच मिनट हुए कि कछुआ , जीत की लकीर पार कर विजेता बन गया ।
यह घटना पूरे जंगल में फैल गई फिर पूरी दुनिया जान गई और बहुत समय बिता पर यह कहानी खत्म नहीं हुई । कहानी चलती चली गई । और चलते चलते एक लेखक से टकरा गई ।
लेखक बोला "ए कहानी तुम देखकर नहीं चल सकती क्या ।"
कहानी बोली " ऐ लेखक तुम ठीक से चला करो, तुझे नहीं दिखता क्या, चलते हो कहाँ, देखते हो कहाँ ।"
लेखक बोला " तुम्हारी ये हिम्मत , तुम जैसे को बहुत देखा है मैंने"
कहानी बोली "अगर देखकर चलते तो मुझसे नहीं टकराते, ना ही मुझे दोष देते । तुम से भले वो लोग हैं जो देखते है और अपने रास्ते निकल जाते हैं, मुझे तो तुम बड़े अश्लील किस्म के लगते हो"
लेखक बोला" अरे, अरे ये सब मत बोलो, सब लोग क्या कहेंगे, मैं अब सच सच बता देता हूँ कि मैं एक लेखक हूँ, अपने पाठकों के लिए कहानी खोज रहा था । तुम सही कहती हो, मैं किसी कहानी की तलाश में ही था, और जो कहानी मुझे पसंद आई , उससे मिलने जैसे ही मुड़ा की तुम टकरा गई । मैं मानता हूँ, मुझसे थोड़ी गलती हुई है, पर मैं गंदे किस्म का आदमी तो बिल्कुल नहीं हूँ घूरना और देखना में फर्क होता है मैडम, आप कैसे किसी पर क्लेम कर सकते हैं"
कहानी बोली" देखो, मुझे फंसाने का काम मत करो, मैं तेरे से फंसने वाली नहीं ।"
लेखक बोला " देखिए, जो हुआ सो हुआ अब मैं अपनी गलती पर सर्मिन्दा हूँ, और नहीं चाहता कि आपको अपनी पीड़ा सुनाऊ"
कहानी बोली" क्या परेशानी है आपको"
लेखक " नहीं रहने दीजिए, मैं खुद अपनी परेशानी दूर कर लूंगा "
"बताइए तो , मुझसे जितना संभव होगा, आपकी मदद करने की कोशिश जरूर करूँगी" कहानी रिक्वेस्ट करते हुए बोली ।
दोनों उसी चौंक के दो कदम की दूर पर, स्टोर के पास रुके । दोनों बाहर लगे कुर्सी टेबल पर जाकर बैठ गए ।
"कुछ ठंडा या कुछ फल फ्रूट खा लीजिए ।" लेखक अपना कंधे से थैला निकाल कर टेबल पर रखते हुए बोला ।
कहानी इधर उधर देखने लगी, कितने यात्रीआ जा रहे हैं । बोली " देखो तुम्हें जो मंगाना है मंगाओ ,मुझसे मत पूछो । मुझे जल्दी जाना है । मैं ज्यादा देर तुम्हारे पास रुक गई तो फिर मुश्किल हो जाएगी । मेरा काम ही सब लोगों से मिलना जुलना । हाल चाल पूछना । अगर तुम्हारे पास ही बैठी रही तो मेरे पाठक का क्या होगा "
लेखक बोला" आपको भी पाठकों की चिंता है, और मुझे भी तब तो मेरी उलझन आप समाप्त कर सकती हैं । अगर सम्भव हो तो ..। मेरी तो आंखें लिखते पढ़ते, और देखते देखते कमजोर होने लगी है , पर वो जो संकट थी आज तक खत्म नहीं हुई है" (थोड़ा रुक कर)
"मेरी कोई कहानी पूरी नहीं होती , हर बार आधे में जाकर अटक जाती है कभी कभी तो पूरी कहानी लिख कर उसका अंत नहीं कर सका । इसलिए सब अधूरी ही रह जाती है ,क्या कारण है इसका"
कहानी बोली तुम ये सवाल मुझसे क्यों पूछते हो ये तो तुम ही बता सकते हो , पर जब से पैदा हुई उसके बाद से कुछ पूछोगे तो बता सकती हूँ ।"
"अच्छा ठीक है अपने बारे में ही बताओ ।" लेखक बोला
कहानी ने अपनी कहानी बतानी शुरू की" सच तो ये है कि मुझे कभी तुम जैसों से डर लगता है, तुम लोग बड़ी उटपटांग हरकत करते रहते हो, लोगों को उल्लू बनाते हो, होता कुछ है लिखते कुछ और हो, सोचते कुछ और हो । तुम लोगों जैसा दुनिया भर में मैंने फालतू और धोखेबाज नहीं देखा । "
लेखक आवक होकर देखता रह जाता है ऐसे जैसे खूंटी पर कोई पैजामा लटका हो ,
कहानी को उसका चेहरा देखकर हँसी आ जाती है , फिर बोलती है, " इतना सब होते हुए भी भी तुम सब से बहुत प्यार करती हूँ । अगर तुम लोगों में से किसी ने मुझे जिलाया नहीं होता, मेरा उपचार नहीं किया होता तो मैं मर गई होती । तुम सब जिस तरह हमें इज्जत देते हो उसके हम कायल हैं । ये बात बताते हुए मुझे संकोच हो रहा है पर सच सच है,
कुछ पाठक तो मुझे दिल से लगाए रखते हैं । मैं भी यह सोच नहीं पाती की किसके साथ वक्त बिताऊं और अपनी व्यथा सुनउँ । पर इतना है जो दो पल को दिल से बात करते हैं , उनका हाल चाल पूछ लेती, कुछ नेक सलाह दे देती ।
लेखक "तुम अपने बनने की प्रक्रिया के बारे में कुछ बताओ "
कहानी बोली" मैं जैसी दिखती हूँ , हूँ तो वैसी ही इसमें कोई शक नहीं, पर ये मत भूलना कि मेरे अंदर कितनी कितनी कहानी चलती रहती है । मेरे भीतर कई कहानी बिगड़ती बनती रहती है ।जो हवा के झोंको की तरह आती जाती रहती है । जितने लोग यहाँ आस पास देख रहे हो सबके माथे में मैं ही घूम रही हूँ । अखबार और किताब मेरी ही प्रस्तुति है ।
ये तो तुम जैसे लेखक की कृपा है जो मेरी फोटो खींच कर दुनिया वालों को दिखाते रहते हो । मैंने तुमसे कितनी बार कहा , ये लोग नहीं मानेंगे । पर तुम मानते ही नहीं ।
कछुआ और खरगोश की कहानी से परिचित हो ही , पर क्या मालूम है इसके भीतर भी कई कहानी है, पर तुम लोग उसका जिक्र नहीं करते । यहाँ पर मुझे थोड़ी तकलीफ होती है पर कोई बात नहीं ।
उस दिन हुआ ये था कि खरगोश ही जीता था , कछुआ बेचारा हार गया था । पर तुम्हारे जैसा एक लेखक आया और कछुआ को जीता दिया , अपनी मनगढंत किस्सा गढ़ कर । अच्छा तुम ही बताओ ,
कभी कछुआ और खरगोश से बात चीत कर सकते हैं , नहीं करते हैं, क्योकि दोनों की भाषा अलग अलग है । इसलिए मैं कहती हूँ इसे उट पटाँग हरकत । खरगोश - खरगोश भले बात चीत कर सकते हैं, कछुआ कछुआ भले एक दूसरे को अपना दर्द साझा कर सकते हैं । और प्रतियोगिता हुई थी तो खरगोश खरगोश में हुई थी कछुआ और खरगोश में नहीं । पर सदियों से झूठ ही लोग सुन रहे , झूठ ही लोग कह रहे । और मैं भी झूठ झूठ सुनते सुनते झूठ को ही सच समझ कर जीती रही । किसी लेखक ने मुझे बताया तुम तो अमर हो । तुम कभी नहीं मर सकती । जब से यह बात जानी हूँ मेरी दुविधा और बढ़ गई ।
सच बताऊं तो कहानी वह है जो कही नहीं गई जो कही गई वो कहानी नहीं है, वो तो कहानी की कहानी है ।
लेखक बोला "बस करो बस करो, हो गया मेरा समाधान, हो गया मुझे आत्म ज्ञान ।"
कहानी बोली" तुम क्या समझते हो, मैं तुम्हें जाने दूंगी, मुझे मत बहकाओ, मुझे तो बस अब तुमसे ही शादी करनी है बस । मैं अब घर बसाना चाहती, हमारे भी दो चार चुन्नू मुन्नू हो , और क्या"
लेखक बोला" देखिए मेरा विवाह हो चुका है, मांफ कीजिए, मेरी गाड़ी आ गई, घर पर मेरी पत्नी इंतजार कर रही होगी । अच्छा होगा आप पाठकों में से ही कोई सुयोग्य वर ढूंढ़ लें । अन्यथा मैं आपका नंबर नोट कर लेता हूँ, जैसे ही कोई तारो ताजा कहानी दिखेगा खबर कर दूंगा ।
कहानी बोली, मैंने जो तुम्हें अपने दिल की बात सुनाई है, उसे हो सके तो अपने पाठकों के पास पहुंचा देना ।
लेखक गाड़ी पर सफर करते हुए सोच रहा था, "एक दिन उस कछुए और खरगोश से भी जरूर मिलूंगा, जिसके परिणाम स्वरूप ये कहानी बनी ।"
"कहानी बनी तो बनी मगर ये जो कहानी बनने की प्रक्रिया है क्या वो भी एक कहानी नहीं । एक पाठक क्या जाने एक लेखक कहाँ कहाँ नहीं भटकता , कहाँ कहाँ के उलाहने ताने झेलने पड़ते हैं, एक कहानी के लिए । "
"मैं घर से निकला, हजारों तरह की बातें , देखते सुनते, फिर एक अजनबी महिला से मुलाकात हुई, बड़ी सज्जन महिला थी । मुझसे पता पूछी । मैंने उन्हें थोड़ा गाइड कर दिया । वो धन्यवाद कह चली गई । पर लेखक मन फिर सोचने लगा अगर ये महिला मुझसे कहीं पहले मिली तो नहीं, अगर फिर मिल जाएं तो । अगर मेरी पत्नी के जगह ये ही होती तो शायद इतनी लड़ाई नहीं होती रोज । पर अचानक घर के दरवाजे पर देखता हूँ वो सामने खड़ी है । पुनः घर में खुद पाकर ये हमें कौन बताए कि वो वाली कहानी थी कि ये वाली । या दोनों में से कहानी की कहानी कौन सी है । "

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 तीन दिन पहले का दिन


मोनू रोज सुबह उठकर दौड़ने जाता है । आज भी वो 4:32 में घर से निकल चुका है दौड़ने के लिए । उसने ये मन बना लिया है कि वह आर्मी में जरूर जाएगा क्योंकि की उसके एक चचेरे भाई ने दो साल पहले ही अपनी जॉइनिंग ले ली है । मोनू को मोबाइल गेम भी बहुत पसंद है । वो कितने सारे लड़ाकू गेमिंग एप अपने मोबाइल में इनस्टॉल किए हुए हैं । उसका मोटो यही कि मुझे भी देश की रक्षा करनी है ,।
सुबह हल्का हल्का कोहरा छाया हुआ है । उसे अपने अन्य साथी आते हुए नजर नहीं आ रहे । जैसे ही वह पुल के पास पहुँचता है देखता है ,उस तीखे मोड़ पर एक बड़ा सा पत्थर रखा हुआ है । सड़क के किनारे ही तो पड़ा । यही सोचते हुए दौड़ते दौड़ते आगे बढ़ गया। तभी उसके पास से एक स्कार्पियो तेजी से गुजरती है । इतने सट कर कि उसके होश उड़ जाते हैं । वो चिल्लाते हुए कहा "अजीब पागल है । दिखता नहीं है । "
गाड़ी अपने रफ्तार में चली गई । मोनू भी काफी दौड़ते दौड़ते आगे निकल चुका था । आगे बढ़ते ही उसके मित्र नजर आए । फिर आगे तक का चक्कर लगा कर लौटने लगे ।
ठीक उस पुल के पास पहुँचने से पहले देखते गाड़ी पलटी हुई है। अब सुबह काफी साफ हो चुका है । लोग भी ज्यादा संख्या में आने जाने लगे । वहाँ जब सब मित्र पहुँचे तो हैरत में पड़ गए । मोनू सोचने लगा ये गाड़ी अभी अभी गुजरी थी या। और बोला भी अपने मित्र से । फिर सबको समझ आ गया कि पत्थर के वजह से एक्सीडेंट हुआ है । दूसरी ओर रास्ता में गड्ढा था । सो ड्राइवर गड्ढे से बचते हुए पत्थर से टकराने की वजह से संतुलन खो बैठा । यही वहाँ सब लोग आशंका कर रहे थे,अनुमान लगा रहे थे । ये हुआ होगा, ये नहीं ।

दूसरे दिन तो मौसम ही इतना खराब हो गया कि घर से निकलना कठिन था । हवा, बारिश और मेघ चारों ओर से घेरे हुए थे । समाचार में बताया जा रहा था , यास नामक समुद्री चक्रवात उठा है । एक दो मौसम ऐसे ही रहेंगे । रूटीन टूटने में मन की स्थिति वैसे ही हो जाती है जैसे गर्म चाय रखे रखे ठंढी हो जाये और पहली घूँट लेकर देखें । तो लगेगा नहीं पी होती तो ही अच्छा था । मोनू को बैठे बैठे मन नहीं लगा ,निकाला अपना मोबाईल और गेम शुरू होगया । और शुरू हो गई फायरिंग की आवाज । एक दो घंटे बाद दिन भर घर में रहते हुए जैसे तैसे दिन कट गया अगले दिन सुबह ही उसका दोस्त जो उसके साथ दौड़ने जाता है , उसके घर पर आया । और दोनों में कौन सी छेड़खानी शुरू हुई कि मोबाईल जा गिरा फर्श पर । दोनों अवाक । ये क्या हो गया । दोनों ने एक दूसरे को देखा । वे जैसे बोल रहे हों , "तेरे ही कारण हुआ ये "। मोबाइल उठाकर देखने पर कैमरा खत्म, और साथ ही स्क्रीन भी कई कई हिस्से में टूट चुका है । फिर क्या, बकवास दोनों में जम कर हुई । दोनों तनाव में, ऊपर से मौसम खराब, ऐसा लगता जिस दिन वो एक्सीडेंट देखा है कुछ ना कुछ बुरा ही हो रहा है । अब बिना मोबाइल के टाइम बिताना और भी कठिन । ऐसे जैसे किसी ने हाथ पैर बांध दिए हों किसी ने उसके ।
रात में किसी तरह अपने कमरे में मोनू सोने की कोशिश कर रहा है । पर नींद कहाँ आवे, उस आँख को जो मोबाईल खेलते खेलते सो जाया करते थे । इतना सन्नाटा, अंधेरा ना जाने क्या सोचने लगा । शायद वो गाड़ी बाराती का होगा । बाराती का होता तो लोग भी तो होते । नहीं खाली गाड़ी होगी । एक्सीडेंट होने से पहले ही ड्राइवर अक्सर भाग जाता है । ये सब सोचते उसे कब नींद आ गई पता ना चला ।
अगली सुबह, मोबाइल बजते ही मोनू हड़बड़ा कर उठता है । देखता है कि अभी तो चार ही बजे हैं । बाहर पर्दा हटा कर देखने पर ।" दिन तो साफ है ।" लगता है वर्षा छूट गई । अपने कमरे की टेबल पर रखे ग्लास के करीब आकर । ग्लास उठाकर । पानी पीते हुए सोचता है, ये फोन कैसे बजा कल जबकि टूट चुका था । फिर डेट और टाइम देखता है । आज कौन सा डेट होना चाहिए उसे याद नहीं । फिर डेट को जानने के लिए अखबार उठाता है । देखता है ये तो कल की ही है । जिसमें मौसम पूर्वानुमान में आँधी तूफान आने की आशंका बतायी जा रही है ।
खैर , इतने में 4:32 हो गए और मोनू घर का बाहरी दरवाजा लगा कर चला जाता है ।
दौड़ते दौड़ते ठीक पुल के करीब पहुँच कर देखता है वो पत्थर वही है जहाँ उस दिन था । और हाँ उस दिन जो एक्सीडेंट हुआ था कोई निशान भी नहीं दिख रहा है । बगल की झाड़ी और किनारे का रास्ता बिल्कुल उखङ - उजङ गया था । हो सकता है दो दिन में सब ठीक हो गया हो । पर ये पत्थर । सोचते हुए बढ़ जाता । फिर क्या होता है , वो पत्थर उठकर बगल की ढलान पर लुढ़का देता है । इतने में गाड़ी आती है, सट निकल जाती है ।
मोनू देखता रह जाता है । ये तो उसी दिन की गाड़ी है क्योंकि उस गाड़ी के पीछे जो दिल का शेप बना था । उसे कैसे भूल सकते हैं ।
वो सोचने लगा ये टाइम ट्रेवल तो नहीं । ये सपना है या हकीकत । नहीं , नहीं हकीकत ही है । सपना नहीं ।
वो खुश था कि वो अपना मोबाइल बचा पाएगा । कल दिन - मौसम खराब रहेगा । जो काम करना है वो वक्त के पहले ही कर लो ।
चन्दन के आते ही वो मोबाइल छिपा कर रख देगा ।
मगर जैसे ही चंदन आया उसने अपने मोबाइल में कुछ दिखाया । फिर गेम शुरू हो गया । चंदन से जरा सी चूक हुई । और मोनू उससे फोन लेने लगा । मगर इसी क्रम में वही हुआ जो उस दिन हुआ था । मोबाइल फर्श पर गिर कर बिखर चुका था । मगर ये मोबाइल तो चंदन का है मेरा नहीं । मोनू खुश हुआ ।
और कहने लगा "उठाओ देखते हैं जोड़ कर कुछ हुआ तो नहीं । "
फोन को जैसे ही उठाकर बैटरी लगाता है । घनघनाना शुरू हो जाता है ।
खुद को अपने कमरे में सोया हुआ पाता है ।
आँखे खोलकर देखता है । अभी चार बजे रहे हैं ।
एक बरगी उसका दिमाग घूम सा गया, कही आज वही दिन फिर शुरु तो नहीं हो गया जो ....वो एक्सीडेंट वाला, तीन दिन पहले का दिन ।

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 रात, चाँद और तन्हाई (डायरी के पन्ने से)

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मेरा नाम किरण है और अभी अपने कमरे में हूँ । हाँ , बिल्कुल अकेली ।कोई बात करने के लिए नहीं पास में । फोन पर भी किसी से बात नहीं कर सकती । और ना कोई शोसल साइट । कारण, पूरे मोहल्ले का लाइट जा चुका है । आँधी , बारिश, तेज हवा, घना बादल कुल मिलकर अनुकूल मौसम नहीं होने के कारण । ये भी हो सकता है कि कई पोल गिर गया हो या ट्रांसफॉर्मर में गड़बड़ी आ गई हो ।
दिन भर लाइट गुम रहा । सारा चीज जिसके कारण स्विच ऑफ हो गया ।
आज शाम को बहुत तेज बारिश हुई । हवा इतनी जोर जोर से बह रही थी कि सारे कमरे का दरवाजा खिड़की बन्द की । ऐसे आवाज हो रहा था कि कहीं कोई फाईरिंग कर रहा हो ।
ठंड भी लगने लगी थोड़ी थोड़ी । नीचे आकर मुझे सॉल ओढ़ना पड़ा । अचानक से एक बार बिजली आई और गई । गई तो फिर आई ही नहीं । अब टॉर्च कौन यूज करता है, जब हमेशा लाइट हो तो । दिन भर बारिश की वजह से इमरजेंसी लाइट फिर चार्ज नहीं हो सका । यानी व्यस्त रहने के तमाम साधन बंद ।
मोमबत्ती से काम चलाना पड़ रहा है । सब कमरा बन्द कर चुकी हूँ । बाहर जाकर देखी कोई आदमी भी नजर नहीं आता है । वैसे भी इस तरफ कम लोग ही आते हैं । हमारा मकान जो सबसे हट कर है । बगल में नदी है , बाँस की बिट्टी, आम का बगीचा है । हर बार चाँद इसी के ऊपर मुझे दिखता है । ऐसे किसी बच्चे की तरह जो गेट से छुप कर देखता है फिर छिप जाता है ।
मोमबत्ती की मध्दिम रोशनी में ही, कई बार कुछ पढ़ने की कोशिश की , मगर इस पीली रोशनी में पढ़ा नहीं जाता, कई बार पढ़ने की कोशिश की मगर किताब बार बार उल्टा पलटा कर रख देती । फिर मन होता फिर से पढूं । लेकिन एक दो पंक्ति पढ़ कर रख देती । मन नहीं लग रहा है शायद ।
जब हर तरफ सन्नाटा हो, बाहर मौसम भी अलग मिजाज में हो तो मन कैसे, पहले जैसा रह सकता है । इसलिए सोची कुछ लिखू पर ये सब मैं क्या लिख रही हूँ । कुछ कहानी जैसी लगनी चाहिए ना । अभी तक मैंने इस रोशनी को देखते हुए जो बातें की क्या वो कहानी नहीं । मन में ऐसे ही कई तरह के विचार उठते हैं । मन भी कितना पागल है ना , उसे कहो कहानी लिखने तो कविता लिखने लग जाता है, कविता लिखने को कहो तो पत्र लिखने लगता है ।
सच कहूँ तो मुझे इतने वर्ष हो गए जीते हुए , पहले लगता था थोड़ा अकेलापन, तन्हाई , जब बेटी अर्चना की शादी हुई , बेटे बाहर चले गए जॉब पर । पति वकालत में व्यस्त रहते रहते शहर में रम गए । पर मैं तो शिक्षण में रही हमेशा बाल बच्चों से घिरे हुए । कभी लगा ही नहीं कि अकेली हूँ ।
अकेलापन और एकांत दोनों अलग अलग बातें हैं । मैंने एकांत को चुना और फिर अकेलापन खलने के बाजय आनंददायी हो गया । जैसे कोई रोमांटिक बॉयफ्रेंड ।
मैं मोमबत्ती बत्ती जलाई और थोड़ी देर तक उसे देखती रही । उसका प्रकाश कैसे फैल रहा है पूरे कमरे में । बल्ब और मोमबत्ती में कितना फर्क है । पर बल्ब की रोशनी में रहते रहते जब एक एक आज वैसी रात आई कि मोमबत्ती जलानी पड़ी । ऐसा लग रहा है जैसे वो प्रकाश के साथ साथ शांति भी बर्षा रहा हो हम पर । मुझसे जैसे बात करना चाहता है । मगर शब्दों में नहीं, बस अपलक उसे देखते रहने निहारते रहने से । और ऐसा लगा जैसे वो मेरे हृदय में प्रवेश कर गया और मैं उसमें । वो असीम शांति को कैसे अभिव्यक्ति दूं ।
और शायद यही कारण है हृदय में तरंग उठी और कुछ लिखने की इच्छा हुई । पर ये सब इतनी तेजी से होता हुआ प्रतीत होता कि कभी पता भी नहीं चलता । मैं लिखने क्यों बैठ गई अभी तो लेटे लेटे पढ़ रही थी ।
कभी कभी सोचती हूँ ये रात क्यों आती है, क्या हमेशा दिन ही ना रहे, फिर ख्याल आया हम सोते क्यों है , ये ख्याल इसलिए आया क्यों कि आँखें इस हल्की रोशनी में बार बार बन्द होना चाहती है । बोझिल सी लगने लगी । यही तो नींद के आने की दस्तक है । हम सोते हैं तो प्रकृति भी विश्राम चाहती है ना । इसलिए रात दिन, सुख दुःख, मिलान वियोग का क्रम चलता रहता है । अगर रात नहीं होती तो क्या हम टिमटिमाते तारे देख पाते शायद कभी नहीं ।
जब छोटी बच्ची थी और जिस दिन जानी थी कि तारे हमेशा उगे रहते है पर सूर्य की रोशनी में दिखाई नहीं देते । उस दिन कितनी आश्चर्य में पड़ गई थी मैं । आश्चर्य की वो ठीक वही प्रतीति अब भी अनुभव होती है जब बल्ब की लाइट में जीते जीते आज मोमबत्ती जलाई । मोमबत्ती को जलाते ही ऐसा लगा जैसे कितने दिनों बाद बिछुड़े हुए प्रेमी से मिली हूँ । है तो ये वस्तु ही पर ये प्रकाश जिससे हमारी आँखें देखने में सक्षम होती है । यह उस कहीं ना कहीं प्रेम की प्रतीति कराता है । प्रेम को तो बस बहाना चाहिए वो तो अपने आप छलकाने लगता है चाहे आँसू के रूप में , चाहे मुस्कराहट के रूप में ।
मोमबत्ती जलते जलते छोटी हो गई और प्रकाश और बढ़ता गया , बाती बड़ी होने की वजह से । क्या ऐसा तो नहीं जैसे जैसे हम जीवन व्यतीत करते हुए आगे बढ़ते हैं हमारा परम् शांति की ओर मिलन की यात्रा तीव्र हो जाती है। कहीं मैं भी इसी प्रकाश से निकली हुई एक किरण तो नहीं ।

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" वो अंतिम शब्द " - (प्रेम कहानी)
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" हेलो" की आवाज सुनकर मधु उत्तर देती है ।
" हाँ, मैं बोल रही हूँ ।" (उदासी से)
" हाँ । बोलो ।" ( आशंका लिए, राज बोला )
"बोल रही थी कि ....."
(दो पल खामोशी दोनों तरफ)
"बोलो..."
"तुम बोलो, "
" मेरे पास कुछ नहीं.... ,नहीं रहने दो । "(असमंजस होकर बात बदलते हुए )
"देखो तुमको सब पता है ना, "
"क्या, नहीं , कुछ बताओगी तब तो ।"
"वही सब"
"देखो मैं कल घर जा रही हूँ, "
"हाँ , "
"तो....."
"कुछ नहीं, "
"कितने बजे आना है मुझे"
"शायद ये लास्ट ..."
" मीटिंग हो हमारी, ठीक है । कंपाउंड में वेट करते हैं । "
बोल्ड टोन में एकाएक कह तो गया पर , राज, कुछ अजीब से ख्याल में , मन में एक उलझाव, सब कुछ टूटने जैसा बिखरने जैसा फील करता है । कुर्शी पर बैठे बैठे सोचने लगता है ।
क्लास में , वो डिस्टर्ब करके हँसना, क्लास 10th,
और मेरा गुस्सा हो जाना ।
कई बार सर से डाँट सुनना । कॉपी में प्रेम पत्र, शायरी वो भी मधु के नाम से लिखने पर ।
फिर एलेवन ट्वेल्व , मित्रता में कोई कमी नहीं बल्कि उसका फ्लेवर चेंज हो रहा था । दोस्ती प्यार में या प्यार जैसा कुछ होने की फीलिंग शुरू हो गई थी ।
एक दिन तो राज अपनी चाची से कहता है । वो एक लड़की भी देख चुका है अपनी शादी के लिए । फिर क्या था उसके घर में भी उसे चांटे लगे ।
मगर यही तो है इश्क , जो एक बार लग गई सो लग गई । बड़ी जबदस्त दाग है किसी भी डिटर्जेंट से नहीं छूटने वाली ।

अब तो मधु के पिता जी , जो कपड़े के व्यवसायी हैं, को भी इन दोनों की दोस्ती की खबर कानों में पड़ने लगी थी । ये बात अलग थी कि वे बस ऐसे ही बच्चों की दोस्ती समझ रहे थे । एक और बात ये थी कि उन्हें अपनी बेटी पर पूरा भरोसा था ।
ग्रेजुएशन की बारी आई । मधु का एडमिशन कॉमर्स में हुआ । और राज का केमिस्ट्री में । दोनों की ब्रांच अलग अलग थी मगर अब दोनों में प्यार का व्यापार और रिस्ते की केमिस्ट्री पूरे जोर पर थी । फर्स्ट ईयर में दोनों समझ चुके थे कि दोनों एक दूसरे के लिए ही बने हैं । अब सिर्फ दोस्ती, प्यार ही नहीं शादी भी करने वाले हैं ।और आलम ये था कि, वे दोनों प्यार रोमांस का सर्वोच्च शिखर छूने के करीब पहुँच गए थे ।
सेकंड ईयर में दोनों की बात कुछ गड़बड़ा सी गई हुआ ये कि जब दोनों ने एक दूसरे के अभिभावकों को बताया तो कई सवाल सामने खड़े हो गए ।
दोनों के परिवार में , पेशे में, जाति वैगरह में मतभेद तो था ही किन्तु सबसे बड़ा प्रॉब्लम मधु के पिता जी ने उजागर किया , वो ये था कि उसकी उम्र देखो और अपनी उम्र देखो । उसकी पर्सनालिटी देखो और अपनी देखो । वो अभी जॉब करेगा अभी किया नहीं है । तुम्हारी उम्र निकली जा रही है । अब पढ़ाई लिखाई छोड़ कर यहीं रहो । शादी हो जाने के बाद जैसा होगा फिर सोचना । मधु चुपचाप खड़ी होकर सुन रही थी । फर्श पर आँखें गड़ाए ।
वो कितना भी प्रयास की पर पिता जी कहाँ मानने वाले थे ।
कुछ ही दिनों में मधु के लिए लड़का सेलेक्ट हो गया । मधु भी काफी उधेड़बुन ,सोच विचार , जज्बातों के उहापोह में ऐसा उलझी हुई थी कि उसे सिर्फ राज के दूसरा कोई नहीं जंचता । और इसी स्थिति में वो सोची की राज के साथ बात कर कुछ बात निकले ।
कंपाउंड खाली सा । राज , मधु के इंतजार में बैठा है । सोचता है , ज्यादातर दिनों में यहाँ कितनी चहल पहल होती थी । पेड़ के सूखे पत्ते, निर्जीव पड़े हुए, वातावरण को बड़े उदासीन से कर रहे थे । राज का मन कई कई बातों की कल्पना में डूबने उतरने लगा। "वो शायद बोलेगी पिता जी मान गए । या कुछ दिन का वक्त मिलेगा । या पिता जी हमें बुलाने को कहे होंगे । और ना जाने पिछली कितनी यादें जो वहीं कंपाउंड में हुई थी । एक एक कर याद आ रहे थे ।"
और अचानक वो आती है पीछे से
कितनी देर से फोन ट्राय कर रही हूँ ।
ओह... आ..गई । थोड़ा घबराते हुए ।
पॉकेट से फोन निकलता है , बैटरी लो, होकर स्विच ऑफ हो गई, रूम पर ही टेन परसेंट था, यहाँ एक डेर घंटे में बंद हो गई होगी ।
राज , मधु से कहता है ।
मधु आज ऐसे आ गई है , जिस हालात में राज ने उसे कभी नहीं देखा था । चिंता से उसकी आँखें धँस सी गई हों जैसे । जैसे रोकर रोकर चुप हुई हो । राज जब चेहरा देखता है उसे कुछ ऐसा ही आभास होता है ।
मधु जब राज को देखती है तो मधु उसे इतना सशंकित पहले कभी नहीं देखी थी । राज के आँखों में आशा की किरण थी पर थोड़ी सी बढ़ी हुई मात्रा बता रहे थे कि उसका दिल शायद उस बात को सुनना नहीं चाहता है जिसकी आशंका दोनों को है ।
माहौल गमगीन । एक दूसरे को संभालते हुए । और खुद के भीतर चल रहे उस बवंडर को रोकते हुए भी । जो सारी सरहदें तोड़ कर ना मालूम उस प्रेम आकाश में समा जाना चाहते हो । जिसे कोई भी जुदा ना कर सके । दोनों टहलते हुए , एक दूजे की उंगली पकड़े कुछ दूसरी बातें केमिस्टि, इकोनॉमिक्स, जॉब, बिजनस, फैमिली सब तरफ से घूम कर आने के बाद , अब जाने की बारी आई । दोनों एक दूसरे को बिना कुछ बोले समझ रहे थे । उनके चबूतरे पर बैठे चॉकलेट के टुकड़े के साथ वे दोनों सोच रहे , काश जिन्दगी भी इतनी मीठी होती । मधु सोच रही थी, मैं तो जो कहने आई थी नहीं कह सकती । वो अंतिम शब्द , अलविदा ।


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Rachnankar - Abhishek kumar "Abhinandan"

C-7a: Pedagogy of social science [ B.Ed First Year ]

1. माध्यमिक स्तर पर पढ़ाने के लिए आपके द्वारा चुने गए विषय का क्षेत्र क्या है ? उदाहरण सहित व्याख्या करें। माध्यमिक स्तर पर पढ़ाने के लिए हम...