बुधवार, 14 मार्च 2018


दौड़िए
क्योंकि यही एक विकल्प है।


दौड़ता हुआ घोड़ा और चलता हुआ आदमी कभी बूढ़ा नहीं होता ’’ आपने कई बार सुना होगा । आइए इसे थोड़ा और सही तरीके से कहते हैं। घोड़े की तरह दौड़ता हुआ आदमी कभी बूढ़ा नहीं होता।

दौड़ना ही जीवन है। दौड़ना यानि गतिमान रहना। गति है , मोशन है तभी तक जीवन है। ठहर गए तो मृत्यु है। जब तक हमारे तन में खून दौड़ रहा है सांसें आ-जा रहीं हैं। तभी तक आप जिंदा हैं। इसलिए जिंदा रहना है तो दौड़िए। स्वस्थ रहना है तो दौड़िए। अमीर बनना है तो दौड़िए। स्वास्थ्य और समय, दोनों हमारे लिए धन के समान है,या कहें धन से कहीं ज्यादा मूल्यवान है। एक व्यक्ति जो दौड़ता है तो समझिए वह पैसे कमा रहा है क्योंकि उसके पैसे, जो दवा पर खर्च हो रहे थे; वह पैसा अब बच रहा है। दौड़ने से, हमारी कार्यक्षमता और सोचने की क्षमता का अद्भुत विकास होता है। चाहे कोई भी क्षेत्र हो, हम जीवन में तभी सफल हो सकते हैं; जब हम शारीरिक और मानसिक रूप से फिट हों।  हम जीवन का वास्तविक आनंद तभी ले सकते हैं जब तक कि हमारा तन और मन दोनों स्वस्थ हों।

आधुनिक कार्य शैली और डेली रूटीन ने हमें बुरी तरह से प्रभावित किया । दूषित वातावरण और मिलावटी / प्लास्टिक युक्त भोज्य पदार्थ का सेवन करने से प्रतिदिन हम इनके दुष्परिणाम से जूझते जा रहे हैं। सारा दिन हम बैठे हुए बिता देते हैं। ऐसे हालात में हर दूसरा व्यक्ति मोटापे का शिकार होता जा रहा है। मोटापा सभी रोगों कि जड़ है। मोटापा से ही सभी खतरनाक बीमारियों को आमंत्रण मिलता है जैसे डाईबीटीज़, ब्लड–प्रेशर, हार्ट अटेक, ब्रेन हमरेज, मिर्गी, हड्डी व जोड़ों में दर्द आदि।

कहा जाता है हमारा शरीर मंदिर के समान है किन्तु अब हमारा शरीर बीमारियों का घर के समान हो गया है। ऐसे घर को खंडहर में तब्दील होने में देर नहीं लगते हैं। अतः सतर्क हो जायें। बस ऐसा समझिए कि आपने दौड़ना शुरू नहीं किया तो मौत, आप का शिकार कर लेगी। या फिर शोले फिल्म का वो सीन याद करें।  जिसमें गब्बर के हाथों की बन्दूक चल जाती है जैसे ही बसंती के कदम रुकते है। बीमारियाँ भी इसी ताक में रहती हैं कि हम गलती करें और उन्हें अटैक करने का मौका मिले। अगर आप इन बातों को नहीं समझ रहे तो फिर बस इतना जान लिजिए कि आप बीमारियों के चंगुल से कभी नहीं निकल पाएंगे। अगर आपने दौड़ना शुरू नहीं किया तो यदा कदा हीनता और मज़ाक का सामना करना पड़ सकता है। अगर आपने दौड़ना शुरू नहीं किया तो आपके सपने, आपके लक्ष्य कभी पूरे नहीं होंगे। कामयाबी तभी आपके पास आती जब आप में आकर्षण हों। आज का युग तीव्र प्रतियोगिता का युग है। जहां रफ्तार ही मायने रखता है। कामयाबी चाहिए तो दौड़िए। कहीं आप पीछे ना रह जायें, इसलिए दौड़िए। स्वयं से प्यार करते हैं तो दौड़िए। स्वयं का जानना है तो दौड़िए । स्वयं को जानना चाहते हैं तो दौड़िए। स्वयं को जीताना चाहते हैं तो दौड़िए।
दौड़ना एक मंत्र है जिसकी पुनरुक्ति से आप लक्ष्य तक पहुँच सकते हैं। दौड़ना ही जीवन लक्ष्य है। यह संघर्ष को पूर्ण रूप से परिभाषित करने में सक्षम है। दौड़ना ही खेल है। दौड़ना ही संस्कृति है। दौड़ना ही वह उपाय है जिससे हम खुद को, समाज को और विश्व को बचा सकते हैं।

आज नदियाँ, पर्वत, जंगल, वायु सारे संसाधन अपने मूल रूप से परिवर्तित/ विलुप्त/ बर्बाद और बेकार हो रहे हैं। अगर हम सब प्रतिदिन मात्र एक आध घंटे दौड़ें तो सब कुछ बचा सकते हैं। दौड़कर हम पूरी मानवता को महान संदेश दे सकते हैं। हम भाई-चारा और एक स्वस्थ प्रतियोगिता को बढ़ावा दे सकते हैं।  हम स्वयं को ऊपर उठा सकते हैं, चाहे हम किसी भी समस्या से घिरे हों। चाहे हमारी आर्थिक, भौगोलिक और बुनियादी चीजें असमान हों। हम दौड़कर अपने साथियों, माताओं, बहनों एवं  तमाम शहर वासियों को जागरूक कर सकते हैं। बस मौका मिले तो चूकिए मत। नींद खुले तो फिर सोयिए मत। उठिए और दौड़ लगाइए। अपनी साँसों को गुनगुनाने दीजिए – कुछ करिए कुछ करिए- (चक दे इंडिया)

जिन्दगी बहुत छोटी है बस थोड़े से मौके हैं। जी जान से दौड़िए। बस दौड़ पड़िए। डर के आगे जीत है और जीत के आगे असली जिन्दगी। जीने का वास्तविक लुत्फ लेना है तो दौड़िए । अगर लिया है सफलता का संकल्प आपने तो सोचिए मत। दौड़िए! क्योंकि यही एक मात्र विकल्प है।


आइए इसकी शुरुआत हम खुद से करें। 8 अप्रैल 2018 को भागलपुर में हो रहे मिनी मैराथन में हिस्सा लेकर खुद को चुनौती दे, खुद को साबित करें।

*****
  




सोमवार, 26 फ़रवरी 2018



हम ही हैं रास्ता


हम ही हैं रास्ता,
हम ही है राही।
इस जीवन की मंजिल,
है क्या ? बता तो सही।

काम काम और काम,
क्या यही है जिन्दगी का नाम।
ढूंढ रहा हूँ पद चिन्हों को,
किस ओर गए हैं मेरे राम।

तत्पर हूँ ताज त्याग करने को,
सहज तैयार हूँ वन गमन करने को।
उत्सुक हूँ, सत्य की रक्षा के लिए,
बता कहाँ शेष है, आग लगाने को।

जीतना जानता हूँ,
फिर भी स्वयं को अनभिज्ञ मानता हूँ।
यही तो रहस्य है जीवन का,
बता तो जरा, मैं जो सोचता हूँ।

हम ही हैं रास्ता,

हम ही है राही।
इस जीवन की मंजिल,
है क्या ? बता तो सही।






-*-*-*-


कोई अपना सा

एक सवाल उठा,
जैसे धुआँ हो गुबार सा,
हाँ, सांसें भी रुक सी गई।


एक जिन्दगी ही सही,
जैसे बाकी सब करते रहे गलतियाँ।
ना जान पाये हम कभी,
सजा जो हमें मिलती गई।

एक खुशी की खातिर,
जैसे चारों तरफ बिछी हो कांटियाँ।
मुस्कुराहटें दी हमने सभी को,
पर किसी को मेरी खातिर एक आँसू ना आई।

एक धुन बजी,
जैसे कि एक लहर
दिल को छू कर चली गई।

एक आवाज आई,
जैसे एहसासों के वे पल।
यादों के झोंके आई और चली गई।


एक दर्द जो जगा गई।
जैसे कोई अपना सा,
चला गया हो दूर कहीं।





*-*-*-*-*


मैं


मैं एकांत हूँ,
इसलिए मैं स्वतंत्र हूँ.
मैं मौन हूँ,
मैं स्वं ही मुग्ध–मंत्र हूँ।

रचनात्मक हूँ
यद्द्पि मैं जीर्ण शीर्ण हूँ.
मैं खुश हूँ,
क्योंकि मैं सम्पूर्ण हूँ.

मैं प्यार हूँ,
मैं पानी की धार हूँ,
मैं प्रकाश हूँ,
मैं जिन्दगी की आश हूँ।

मैं हंसी हूँ,
मैं मज़ाक हूँ।
मैं सबकुछ हूँ
और मैं ही खाक हूँ।



-*-*-*-*-


जो तेरा रूप है.

सोना सा,
ये जो धूप है.
भाए मुझे,
जो तेरा रूप है.

यादें...
जैसे ठंडी हवाएँ.
आए – जाए,
कभी हँसाए ये कभी रुलाये.

वो अदायें, हाय ....
गुस्साना और मान जाना तेरा.
तू पास नहीं तो क्या...
रहूँगा हमेशा, दीवाना तेरा.


कभी बातें न करके ,
अन्दर ही अन्दर तड़पावे तू.
मुझसे दूरियाँ बनाके,
हाँ बता जरा, खुद को भी क्यूँ तड़पावे तू.

जाने न कोई,
दिल मेरा क्या कह रहा.
हाँ तू ही मेरी,
किस्मत जो ऊपर वाला लिख रहा.

सोना सा,

ये जो धूप है.
भाए मुझे,
जो तेरा रूप है.




-*-*-*-


हमारी लाइफ

             हमारी लाइफ, आपकी लाइफ, हम सबकी लाइफ । ये बड़ी अजीब पहेली है इसे समझना बड़ा मुश्किल है और ये कह दें कि इसे 100% समझना ना मुमकिन है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। हाल ही में जो मैंने फील किया है दो चार बातें हैं। -
पहला-
जैसा व्यवहार, कर्म या विचार आप करते है वैसा ही आपके साथ होता है चाहे समय कुछ परिस्थिति कोई भी होता अवश्य है। अतः कर्म करते वक्त सचेत रहें क्योंकि भविष्य निर्माण इन्हीं कर्मों का परिणाम है।
दूसरा –
हमारे जीवन को प्रभावित करने में इच्छा शक्ति बहुत बड़ा कारक है। हम जो भी जिस चीज के बारें में चिंतन मनन करते हैं, या फिर उस चीज की कामना करते हैं वो चीज, वो बातें स्वतः एक ना एक दिन हमारे साथ घटित हो जाती है। शायद किसी ने ठीक ही कहा है- मिलता उन्हीं को है जो धैर्य के साथ जीते हैं।
तीसरा –
जिन्दगी की अपनी चाल होती है उसकी अपनी रफ्तार होती उसकी अपनी लय होती है। वह किसी के अनुसार नहीं चलती उसकी लय होती है। वह किसी के अनुसार नहीं चलती उसकी रूप रेखा स्वतंत्र है शायद यही कारण है कोई उसकी एकदम सटीक तरह से जानकारी इकट्ठा नहीं कर सकती। जीवन या भविष्य का सही सही अनुमान नहीं लगाया जा सकता है हाँ आंशिक रूप से संभावनाओं को समझा जा सकता है।
चौथा-
किसी लक्ष्य, कार्य या वस्तु का चयन करें तो दिल से करें । चयन करते समय किसी ना किसी चीज से समझौता करना ही पड़ता है मगर समझौता करने की भी एक हद होती है। दिल को जो करना है वो तुमसे करवा ही लेगा और तुम उसमें जीत हासिल कर ही लोगे ये निश्चित है। हाँ, चुनाव दिल से होना चाहिए। मजबूरी में किसी के दबाव में चुनाव मत करो।

 हम जीवन को ऐसे जीते हैं जैसे हम सबकुछ कर सकते हैं पर वास्तविकता ये है कि हम जीवन में सिर्फ और सिर्फ एक ही कार्य करने आए हैं।  एक ऐसा कार्य जो हमारे अलावे हमारे तरीके से कोई कर ही नहीं सकता। हम समय की अपने परिस्थिति और मनोस्थिति की तीव्र वेग में बहते चले जा रहे हैं। मेरा यहाँ समय से मतलब है हमारी आज की दुनिया में जो कुछ हो रहा है या भविष्य में जो परिवर्तन होने को है और परिस्थितियों से है।


                हमारी वर्तमान पारिवारिक / सामाजिक / आर्थिक स्थिति और मनोस्थिति से तात्पर्य है वैसे तमाम विचार जो कई वर्षों से लगातार हम सोचते समझते देखते जीते चले आ रहे हैं। हमें मालूम नहीं होता कि हम क्या कर सकते हैं और क्या नहीं कर सकते और ये भी कि हम आगे क्या करने वाले हैं। इस पल जो कुछ कांसस और सब-कांसस माइंड से कर रहे हैं। भविष्य में भी हम यहीं कर रहे होंगे और इसी के परिणाम हमें मिलेंगे। हमारे परिणामों से हमें कोई वंचित नहीं कर सकता।  जीवन कि रोमांचकता तो इसी में है कि हम भविष्य को कितना अदभूत तरीके से लेते हैं सोचते हैं और अनभिज्ञ भी रहते हैं।

             वर्तमान ही जीवन है। परिवर्तन ही जीवन है। इस प्रकार कह सकते हैं। परिवर्तनशील वर्तमानपल ही जीवन है जिसे हमें पूरे हृदय से जीना चाहिए। कोई भी समय पर्फेक्ट नहीं होता क्योंकि परफेकसन पाने या होने कि प्रक्रिया ना चाहते हुए भी जाने अनजाने जारी रहती है।  

-*-*-*-*-*-

शब्द – रचना

           शब्द की शक्ति अनन्त है। शब्द में इतनी शक्ति है जितनी हमारी आत्मा में। शब्द आत्मअनुभूति का एक सशक्त साधन है और पर्याय भी। शब्द कभी खत्म नहीं होते किन्तु ये संभव है शब्द परिस्थिति या भाव वश अपना रूप बदल ले। शब्द हमारी आत्मा की आवाज है। हमारी भावनाओं का प्रवाह है। शब्द हमारे विचारों का श्रोत है। शब्द रंग है, कशीदा है, कलाकारी है। शब्द जिन्दगी के चादर का धागा है। धागा के बिना ना चादर है और ना शब्द के बिना ना जिन्दगी ना ये संसार। शब्द एक विज्ञान है, प्रकृति के, प्रवृति के, प्रेरणा के, अनुभूति के, कल्पना के और तमाम रहस्यों के प्रकटीकरण का। शब्द के मूल में ही सृष्टि है, सृजन है और विनाश भी। शब्द के कई विषय हैं और सारे विषय शब्दों में ही पंक्तिबद्ध हैं। शब्द में समय संचित हैं।

            शब्द के प्रकटीकरण के कई तरीके है। किन्तु मुख्य रूप से दो हैं एक आवाज के जरिए तो दूसरा लिखावट के जरिए। दोनों की अपनी महत्ता है। एकरूप में तरंग - गीत है तो दूसरे में  मूक- संगीत। एक सूरज के किरणों सा चमकता है तो दूसरा बारिश में भिंगने का एहसास देता है। सचमुच लिखना या पढ़ना बारिश होने के जैसा है जिसमें विचारों की अनगिनत बुँदे लगातार गिरने से सुखी धरती को जलमग्न कर देती है। वैसे ही विचार हमारे प्यासे मन- मस्तिष्क को तृप्ति मिलती है, अनुभूति मिलती है। आनंद मिलता है, उत्साह जागता है। प्रेरणा के कमल खिलने लगते हैं जैसे बादलों के दलदल से बिजली चमकने लगती है। किसी भावनाओं की अभिव्यक्ति करना किसी विचार को लिपि बद्ध करना सागर से मोती चुनकर उससे माला बनाना सरीखा है। ये कला और विज्ञान से परे की साधना और अनवरत अंत हिन संघर्ष।

               कोई भी रचना हो। उस रचना में मौलिकता उसकी आत्मा है। तर्क बौद्धिकता को दर्शाता है। तथ्य रचना को सारगर्भित बनाता है और प्रमाण उस रचना को पठनीय । रचना की भाषा जितनी सरल, सहज और स्वाभाविक होगी वह उतनी ही पाठक को रुचिकर लगेगी। पाठक उसी रचना से रस लेंगे। उसी का अनुकरण करेंगे और उसी की बात भी करेंगे। वैसी ही रचनाओं की पत्र / पत्रिकाएँ या पुस्तक / पुस्तिका खरीदेंगे हाथों हाथ लेंगे।

               आज मनुष्य स्वयं  को पारंपरिक की बजाय आधुनिकता या कहें डिजिटलायजेसन को अधिक तबज्जो दे रहा है। वह ऑनलाइन ही समाचार पत्र / मनोरंजन पत्रिका / कॉमिक्स / उपन्यास एवं छोटी – बड़ी कहानियाँ पढ़ रहा है। उसके पास मनोरंजन और सूचनाओं कोई अन्य सुलभ साधन उपलब्ध हैं। सोशल नेटवर्किंग साइट्स लोगों को ज्यादा लुभा रहा है। साहित्य बीते दिनों की बात प्रतीत होती है। अगर साहित्य की बात होती भी है कहीं तो नॉवेल अँग्रेजी शब्द का प्रयोग किया जा रहा है और अँग्रेजी के ही रायटर जैसे चेतन भगत, अमिश शर्मा और ना जाने कितने। जो भी व्यक्ति साहित्य में रुचि रखता है वह अँग्रेजी की तरफ अनायास ही आकर्षित हो रहा है। वैसे भी भारतीय जन मानस में इस तरह पठनीयता की कमी काफी लंबे समय से हैं। शहरी या मेट्रो सिटी के लोगों को अँग्रेजी की रचनाओं की तरफ रुझान ज्यादा है तो वही ग्रामीण क्षेत्र के लोगों का रुझान धार्मिक पुस्तक रामचरित मानस / महाभारत / या अन्य धार्मिक पुरानी साहित्य में ही रामा सा प्रतीत होता है। कुछ शिक्षित मध्यम वर्गीय परिवार को छोडकर लोग व्हात्सप्प / फ़ेसबुक के कामचलाऊ, मिडियाई, बल्गर, अप्रामाणिक, बातों में ही लगे हैं। जो समय की बर्बादी मात्र है। ये एक बम की तरह शक्तिशाली  है इसका सही इस्तेमाल होना चाहिए। और अनावश्यक बातों से बचना है तो पुस्तक से ही दोस्ती करनी होगी प्ले बुक से नहीं। लेखकों के लिए भी यह एक चुनौती है कि वे अधिक से अधिक अपने पाठक को कैसे आकर्षित कर सकते हैं।      

प्रश्न – पुस्तक का नाम क्या हो ? कैसे उस कहानी या किताब का नाम निर्धारित करें?
उत्तर- मुख्य रूप से दो प्रकार के शीर्षक हो सकते हैं पहला पात्र का नाम या जगह का नाम या उसका कहानी की मुख्य चर्चा। प्रेमचन्द्र की रचनाएँ लीजिए, ईदगाह, पंच परमेश्वर, गोदान। शीर्षक अंत से लिया गया है, कहानी का मूल उद्देश्य व शिक्षा और मुख्य घटना ।
-*-*-*-

C-7a: Pedagogy of social science [ B.Ed First Year ]

1. माध्यमिक स्तर पर पढ़ाने के लिए आपके द्वारा चुने गए विषय का क्षेत्र क्या है ? उदाहरण सहित व्याख्या करें। माध्यमिक स्तर पर पढ़ाने के लिए हम...