बुधवार, 16 अगस्त 2017



प्रभात फेरी

भारत माता की - जय ! वन्दे मातरम् ! महात्मा गाँधी - अमर रहे ! सुभाष चन्द्र बोस - अमर रहे ! भगत सिंह - अमर रहे ! भारत माता की - जय ! भारत माता की - जय !.....
उस वक्त मैं प्रथम कक्षा का छात्र होऊंगा. ये वाकया मुझे आज भी खूब अच्छी तरह से याद है. जिसे आज मैं आपसे शेयर कर रहा हूँ.
बच्चों के बुलन्द आवाज सुनते ही मैं जगा. शायद प्रभात फेरी जा रही है. मैं झट से अपने बिस्तर से उठ कर घर के मुख्य दरवाजे की तरफ भागा. मैंने देखा मेरे साथी जोर-जोर से नारा लगा रहे थे. “आज क्या है.......15 अगस्त.” “आज क्या है...स्वतंत्रता दिवस.”  हाथों में तिरंगा झंडा लिए सारे बच्चे आगे बढ़ते चले जा रहे थे. काश मैं और पहले जग गया होता तो मैं भी इस प्रभात फेरी में शरीक हो गया होता. पर क्या करूँ. मन तो कर रहा था दौड़ कर उस पंक्तियों में जा मिलूं. पर नहीं, मैं तैयार भी तो नहीं. मैं इन कपड़ों में कैसे जा सकता हूँ. कई बच्चे मुझे देख कर तो हँस भी रहे थे कि मैं अभी-अभी सोकर उठा हूँ.  
भीड़ जा चुकी थी. मैं निराश होकर वहीँ दरवाजे पर बैठा उन आवाजों को सुनकर ये कल्पना करने लगा कि मोड़ तक सब पहुँच चुके होंगे. अब तो वे सब पाठशाला भी पहुँच चुके होगें. मैंने मन ही मन माँ से कहा –“तुमने मुझे क्यों नहीं उठाया, तुम जानती हो आज प्रभात फेरी थी.”
तभी पीछे से माँ की आवाज आई..... “शेखर.....”, “शेखर.....”
“उठो बेटा...., स्कूल नहीं जाओगे.”
मैंने कहा “अब क्या करूँगा स्कूल जा कर....”
तभी अचानक मुझे होश आया...
“क्या कहा ? स्कूल जा कर क्या करेगा ? मालूम नहीं तुझे आज क्या है...”माँ ने कड़क स्वर में कहा.
मैं समझ चुका था कि क्या माजरा है. मैं नींद में था. मैं तो अब तक सपना देख रहा था और अचेतन अवस्था में बोल रहा था. ये विचार मन में आते ही मैं आँगन की तरफ भागा.
क्यों कि बीते शाम को मैंने तिरंगा झंडा बना कर सूखने के लिए रखा था.पर यह क्या झंडा गायब. झंडा ना पाकर मन में दुःख हुआ. मैंने परेशान होगा पूछा- “माँ! झंडा कहाँ है?”
माँ ने कहा- “मुझे क्या पता, जल्दी नहा लो. देर हो रही है.”
मैंने फिर सवाल दुहराया.
तो  माँ ने पूछा - “कहा रखा था तुमने?”
“यही तो आँगन में” मैंने हाथ से इशारा करते हुए कहा.
“तो यही कहीं होगा या फिर रात को ओश से गल गया होगा. कागज का था ना.”
“तो लकड़ी तो होनी चाहिए ना.” मैंने कहा.  रुआंसे स्वर में कहते ही मेरे आँखों में आँसू आ गए.
माँ ने कहा –“तो रो क्यों रहा है फिर बना लेना. इसमें रोने की क्या जरुरत”
अब समय कहाँ है. मन ही मन कहते हुए बाथरूम की तरफ बढ़ा.
मन बड़ा परेशान था. कई तरह आशंकाएँ उठ रही थीं. आखिर हुआ तो क्या हुआ. कोई ले तो नहीं गया. नहीं रात को सोने के पहले तक तो मैं देख कर गया था. सही सलामत था. आज की भांति उस समय, तिरंगे प्लास्टिक के मैंने देखे भी न थे. बस कपडा वाला ही होता है यही जनता था. और होता भी होगा तो गांव में कहा. मैंने कितने जतन से बनाया था वो तिरंगा झंडा. पहले तो कागज को एक दुसरे से चिपका कर बड़ा किया. फिर गेंदा फूल को इक्कठा कर केशरिया रंगा. फिर उसकी पत्ती से हरा रंग रंगा. डेर सुई की मदद से चक्र बनाया. एक मोटी सी छड़ी खोज कर उस से चिपकाया. इतनी मेहनत के बाद क्या मिला. झंडा गायब.  
मैं नहा कर तैयार हुआ. माँ शायद रसोईघर में चाय बना रही थी.
तभी पास का ही एक साथी ऋषि मेरे घर आया. बोला –“जल्दी चलो देर हो जाएगी.”
“मुझे नहीं जाना” मैंने कहा
उसने पूछा “क्यों ”
मैंने कहा “बस कुछ नहीं कल जो मैंने झंडा बनाया वो मिल नहीं रहा.”
वो बोला- “ तो क्या हुआ, बहुत सारे लड़के के पास झंडा नहीं होगा.”
 वो मुझे हाथ पकड़ कर खीचने लगा.
पर मेरे मानो मेरे पैर जमीं से चिपक गए हों.
मेरे कदम उठ ही नहीं रहे थे. झंडे ना मिलने की वजह से मैं विद्यालय जाना नहीं चाह रहा था.
उसने कहा “क्या हुआ अब तेरे को, अरे वहां जायेगा तो कम से कम दो जिलेबियां तो मिलेगी?
मैंने कहा- “तुझे खाने की पड़ी है.”
इतने में माँ आवाज देती है.
“लकड़ी वहां रखी है. लेते आओ.”
मैं जैसे ही कमरे के पीछे  लकड़ी लेने गया एक कोने में तिरंगा झंडा पड़ा मिला. मैंने झट से चिल्लाया - माँ देखो .झंडा यहाँ है.
“क्या कहा” माँ ने कहा.
“झंडा मिल गया.” मैंने कहा
“इधर आ लकड़ी ले के पहले” माँ ने कहा.
मैं रसोई घर में लकड़ी रखा. और तिरंगा झंडा लिए दौड़ पड़ा.
मेरे अन्दर ऐसी विद्युत सी उर्जा का संचार हुआ. पैर को जैसे पंख लग गए हों. मन उत्साह से भर उठा. उस वक्त जो मनःस्थिति स्थिति थी मेरी वो अब कहाँ. कितना पावन. कितना निच्छल. देश प्रेम से ओतप्रोत. आज जब मैं खुद को तुलना करता हूँ तो अभी की देश भक्ति की जो भावना है उसमें न जाने कितने तरह के बिष घुल गए है.
 जाति- धर्म, भाषा- प्रांतीयता और ना जाने कितने दोष. हमारी सोच आज कितनी स्वार्थपूर्ण हो गई है. दिन- रात हम सर और सिर्फ अपने बारे में, अपनी सुख सुबिधा जुटाने में लगे हुए है. और जो भी अपना रोजगार या नौकरी कर रहे है जिससे देश को विकास के पथ पर आगे ना बढ़ा कर उसके राहों में रोड़े पैदा करते हैं. आये दिन तथाकथित बड़े बड़े घोटाले सामने आ रहे हैं. सृजन घोटाला प्रत्यक्ष प्रमाण है. हमें जितना ज्यादा खतरा सीमा क्षेत्र में उससे कहीं ज्यादा अन्दर के दुश्मनों से है.
कुछ ऐसे ही भाव हमारे गणमान्य अतिथि और शिक्षक गन से सुनने को मिले पर उस वक्त तो ये ध्यान और ज्ञान कहाँ होता है कि देश के अन्दर-बहार क्या होता है. अगर होता भी है तो उससे ज्यादा इंटरेस्ट तो उन मीठे जिलेबियों में होता है. कतार में लगे धूप में पक रहे छोटे बच्चे को यही लगता है कि कब बकवास समाप्त हो और जिलेबी हाथ में आये. आखिर पूरा गांव की परिक्रमा कर चूके थे सब. और गले भी तो सुख रहे थे.
दो ढाई घंटे बाद कार्यक्रम समाप्त हुआ. जिलेबियाँ बंटनी शुरू हुआ. मेरी बारी अभी आनी बांकी थी. मैं प्रतिदिन पाठशाला आने वाला छात्र था. आज वो बच्चे कतार में खड़े थे जिन्हें मैंने पहले कभी नहीं देखा थे.कुछ के नाक बह रहे थे, तो कोई पता नहीं कितने दिन से नहाया ना हो. कुछ के पेंट जमीं में लोटते जा रहे थे तो किसी का पेंट छाती को छू रहा है. कोई अपने छोटे भाई को ले खड़ा है तो कोई बड़ी बहन अपने छोटे भाई को गोद में. छोटी छोटी हथेलियाँ जिनमें एक जिलेबी मिल जाए तो ऐसा लगता जैसे उन्हें मेहनत का फल मिल गया. और जिन लड़कों ने हालाँकि ये पहली दूसरी कक्षा में पढ़ते हों पर गाली देने में पीएचडी कर रखी हो. आखिर वो लड़ भीड़ कर अपने हाथ में जिलेबी पा ही लिए. जो स्मार्ट टाइप के बन्दे होते वो पहले ही कह देते हे हों “हमरा सौसा जिलेबी दिहो ने तअ हम्म नाय लेभों” जो अच्छे घराने के होते. सर उसे दो पिस देने की सिफारिश कर देते. कहते “मम्मी को दे देना. मेरी तरफ से.” किसी अन्य को भी रोकते हुए कान में कुछ कहते . नहीं मालूम क्या उन्होंने कहा. पर कुछ ऐसा जरुर कहा जिससे वो लड़की सरमा रही थी. अंत में उस लड़की के वह से हटते-हटते कह देते – “माय क कहिय, आय हम्मअ पहुची रहलो छियों.”
रात हुई. मैं दिन भर किये हुए काम और बातचीत को पुनरवलोकन कर रहा था. इतने में माँ आई.
पूछी “खाना नहीं खायेगा का जो छत पर पसरा हुआ है.”
मैंने कहा- “क्या बनाई हो?”
वो कहीं –“क्या बताउगी, तभी खायेगा”
मैं कड़क स्वर सुन कर पलक झपकते ही उठ खड़ा हुआ और माँ के पास जा बैठा. अभी - अभी मेरे आँखों में तारे झिलमिला रहे थे और अब रोज रोज एक ही तरह की सब्जी देखकर आखें गड़ने लगी.
बचपन में मुझे सब्जियों से सख्त नफरत थी. खास कर पटल और कद्दू से. खैर मैं ने खाना शुरू किया. और अच्छा माँ बताओ “तुमने ही झंडा रखा था ना, मुझे बताया क्यों नहीं. मैं बेवजह परेशान हो रहा था.”
माँ- “तुझे तो अपनी पड़ी है, ये देखता है कि एक सुबह से मैं कितना खटती हूँ.”
मैं चुप माँ की तरफ कृत्यज्ञता से निहारता रहा. वो फिर कहीं “अपना और अपने सामान का ख्याल रखना कब सीखोगे.”
मैं उस वक्त नहीं समझता था उस फिक्र को. माँ के उस डाट फटकार को. पर वही तो असली प्यार था. जिसका आज मैं मोहताज हूँ.
मैं पुनः अपना बिस्तर ठीक कर लेट गया. खुले आसमान को निहारना सचमुच आजदी का एहसास दिलाता है. साथ ही साथ हम अपनी नगण्यता और अज्ञानता का भी बोध होता है. मैं इस स्वप्न में खो गया कि एक दिन मैं भी अपने पिता की तरह दुश्मनों से लड़ते हुए सीमा पर शहीद हो जाऊँगा. और इन सितारों की भांति मैं भी आसमान में चमकूँगा. आज मैंने प्रभात फेरी में हिस्सा लिया और इश्वर करे एक दिन मैं भी राष्ट्रीय परेड का हिस्सा बनूँ. जिनके 
क़दमों से धरती हिल जाए...

............

सोमवार, 26 दिसंबर 2016

दृष्टिकोण

स्कूल में सम कोण, विषम कोण, त्रिकोण, षटकोण, संगत कोण और ना जाने कितने तरह के कोण पढाये- बताये जाते हैं. किन्तु एक कोण ऐसा है जिसे ना किसी स्कूल या ना कॉलेज में बताया जाता है. वो है दृष्टिकोण. जिसे नज़रिये के नाम से भी नवाजा गया है. जो जीवन के अनुभवों से संग्रहित,पुस्तकों से सिंचित एवं बुजर्गों के सुझाव से पल्लवित, पुष्पित होकर निखरता- महकता है. 

दृष्टिकोण यानी नज़रिया. इसका दायरा बहुत बड़ा है. ये समझने के लिए, जितनी मुश्किल है उतना ही जरुरी भी. इस विषय पर ज्यादा से ज्यादा अनुसन्धान किये जाने की जरुरत है. नजरिया यानि दृष्टी कोण. जितनी नज़र उतने नजरिये. जितने ज्यादा शब्द उतनी ही मात्रा में दृष्टिकोण. जिस प्रकार एक पत्थर में जितने कण हो सकते हैं ठीक वैसे ही उतने ही विचार, उतने ही दृष्टीकोण जो किसी भी वस्तु या विषय पर परिलक्षित होते हैं. शायद एक अलग नज़रिए से दुनिया को, जीवन के अनेक पहलुओं का अवलोकन कर उसकी व्याख्या करना दार्शनिकता कहलाती है.

हम अपने दैनिक जीवन में कई तरह बातें सोचते हैं और उसे पूरा करने की कोशीश करते हैं. हमारे हाथ कभी सफलता, तो कभी असफलता लगती है. इन सफलताओं और असफलताओं या किसी भी खेल का जीत या हार पर हमारा दृष्टीकोण एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है. हमारी मानसिकता ही हमारे जीवन के विभिन्न परिणामों के लिए जिम्मेवार होती है. हमारी जो वर्तमान सोच है या जिस तरह से सोचने का तरीका है, ये सारी चीजें एक दिन में नहीं बदली जा सकती है. हमारे दृष्टीकोण को मूर्तरूप लेने में काफी समय लग जाता है या यूँ कहें कि समय के साथ-साथ हमारी सोच भी बदलती जाती है. हमारी सोच, हमारे दृष्टी कोण का ही परिणाम है.

हम किस क्षेत्र, किस धर्म, किस भाषा से ताल्लुक रखते है?, हमें बचपन से आज तक किस तरह के वातावरण में पढने लिखने का मौका मिला?, हम किसी सदी में पैदा हुए ? उसी सदी में कौन- कौन से विश्व्यापी घटनाएँ हुई? उस समय में तमाम क्षेत्र के नेता के स्वयं के दृष्टी कोण और फैसलों से सामाजिक दृष्टि कोण प्रभावित होती है. सामजिक दृष्टिकोण को बदलने या प्रभवित करने में मिडिया की भी महत्व पूर्ण जिम्मेवारी होती हैं.

कुछ चीजें हमें बहुत पसंद होती हैं और कुछ चीजें बिलकुल ही नापसंद. ये पसंद और ना पसंद हमारी मनोवृति की सूचक होती है. जैसे हमारी मनोवृति होती है वैसा ही हमारा स्वाभाव और वर्ताव होता है. चूँकि हर मन की अपनी मति और गति होती है. ऐसा माना जाता रहा है मानव मन बड़ा चंचल होता है. इसे स्थिर करना बहुत ही मुश्किल काम है. जैसे कि आंधी में दीपक को बुझने से रोकना. खैर ये तो साधू संन्यासी का काम है कि अपने मन को वस में रखना. एक आम इन्सान इस विलासी दुनिया से कैसे बच सकता है.आपने भी धर्मात्माओं को कहते सुना होगा मन को संतुलित और संयमित करने के अनोकों फायदे हैं और अगर आप अपने अंतर मन से दोस्ती कर लेते हैं तो आपके अन्दर की ज्योति जलते देर ना लगेगी. दुःख, सुख, ईर्ष्या, द्वेष, अभिमान क्रोध आदि तामाम तरह की भावनायें हमारे में समय और परिस्थति के अनुसार घूमते रहते हैं. हम उन्हें आजीवन झेलते, सहते और महसूस करते रहते हैं. हम कभी अपने मन के प्रत्यक्षदर्शी होते हैं तो कभी मन और हमारा भेद मिट सा जाता है और जब मिटता है तो उस प्रक्रिया को उस वक्त महसूस नहीं कर पाते. जब वक्त बदल जाता है तब हमें ध्यान आता है कि हम किस स्थिति में और हम क्या सोच रहे हैं. इस सोच के फायदे नुकसान क्या है? इन तमाम घटनाओं को देखते हुए हम पातें हैं कि हमारा मन अगर दर्पण है तो हमारा दृष्टीकोण हमारा नजरिया हमारी सोच उसका प्रतिबिम्ब. हालाँकि हम 100% नहीं कह सकते कि हमारी सोच पर सिर्फ हमारे मन का ही प्रभाव है हमारे नजरिया पर एक दृष्टी से देखा जाये तो दिमाग की भूमिका अधिक है हमारा दिमाग ही हमें सोचने को मजबूर करता है सोच को व्यवस्थित करता है विचार को उत्पादित पोषित संचारित करता है. ये चाहता है पर वह ठीक तरीके से काम नहीं कर पाता. इसका मूल कारण है कि हम जो परिणाम चाहते है, उसके लिए हम अपने दिमाग को ट्रेंड (प्रशिक्षित) नहीं कर पायें हैं. और जहाँ तक हम अभी सोचते हैं उतने तक ही हम अपने दिमाग को डेवलप कर पायें हैं. अपने दिमाग को प्रशिक्षित करना बड़ा कठिन काम है.किन्तु ऐसा नहीं है दिमाग तभी प्रशिक्षित होगा जब हम करना चाहेंगे. यह वातावरण और घर परिवार यहाँ तक कि गर्भ से ही प्रशिक्षित होता चला जाता है. यही कारण है कि कुछ बच्चे भूत का नाम सुनकर डरते हैं तो वही कुछ बच्चे हँसते हैं. ऐसे फर्क का एक मात्र कारण है बचपन में उसे माता- पिता द्वारा दी गई सुचना या उनके द्वारा किया कहा गया बर्ताव है. मान लिया जाय कि हमने शाहरुख़ खान की फिल्म ‘ॐ शांति ॐ’, ‘मैं हूँ ना’ या कोई भी देखी. उस फिल्म को देखने के बाद फिल्म के पोस्टर के प्रति जो नजरिया बना था, उस फिल्म को देखने के पहले वैसा नहीं था. यानि सूचनाओं से हमारी सोच बदलती है सूचनाओं से हमारी धारणा परिपक्व होती है यह अलग बात है कि वो सूचना सच्ची हो अथवा झूठी. पर इतना तो निच्शित है कि झूठ हो या सच तमाम तरह की बातों से हम कहीं ना कहीं प्रभावित, प्रेरित, कुंठित या क्षुब्ध आदि होत्र हैं. ऐसे नजरिये की स्थिति में समय का योगदान भी कम आँका नहीं जा सकता है. अगर समय पर सूचना नहीं मिली तो हमारी सोच अलग होगी अगर समय से पहले ज्ञान व जानकारी हमें प्राप्त हो जाती है तो समस्याओं से मुकाबला करने में हमें ज्यादा परेशानी नहीं होती है. 

तो सवाल उठता है कि किस तरह का नजरिया हमें अपनाना चाहिए ? इस तरह उठता है कि किस तरह का नजरिया हमें अपनाना चाहिए? इस तरह के नज़रिये का स्वागत किया जाना चाहिए पर जहाँ सफलता की बात हो तो सकारात्मक नजरिया अपनाना चाहिए. कभी कभी हम देखते हैं कि कुछ तरह के दृष्टी कोण हमने लाभ कम हानि ज्यादा पहुंचाते हैं. ये लाभ हानि का सही आकलन हमें तब मिलता जब हम निश्पक्ष होकर देखते हैं और लाभ हानि को हम उसी रूप में सहते हैं जिस रूप में अंत में अपना नजरिया बनता है उस वस्तु या विचार के प्रति. यदि तमाम रूकावट झंझावातों से हमारे नजरिये बनते बदलते रहते हैं. अंत में यह प्रक्रिया कुछ धीमी हो जाती है कभी यह प्रक्रिया रुक जाती है और जब रुक जाती या जब परिपक्व हूँ जाती है वह एक व्यक्तिव और विचारधारा के नाम से जानी जाती है तो वह एक व्यक्तित्व और विचार धारा के नाम से जानी जाने लगती है. ये नजरिया ही है जो हममें उत्सुकता, कौतूहलता, उत्साह आदि ना जाने कितने तरह की भावनायें हम में भरता है. इस नजरिया से ही हम अपनी बातों को भावनाओं को प्रकट करते हैं. हमारी जैसी सोच होती है वैसा ही हमारा लक्ष्य होता है उन लक्ष्य को बना कर ये नजरिया ही कभी हमें प्रेरित तो कभी पराजित करता है कभी खोखले होने का भंडाफोड़ करता है तो कभी गुणों की प्रशंसा करता है. हम अपने ही नज़रिए से दुःख से कभी ज्यादा दुखी कभी कम दुखी होते दुःख का कारण तो वैसे का वैसा ही पर समय के साथ हमारा नजरिया बदलता जाता है फिर हम उसे विचार को उस भावना को दूसरे ढंग से देखने लगते हैं मान लिया जाय. किसी अपने प्रियजन की मृत्यु या जन्म होता है तब उस वक्त शोकाकुल या प्रफुल्लित हो जाते पर जैसे ही समय बदलता वैसे ही हमारी सोच भी बदल जाती है. हम एक नज़रिये से नकार देते हैं कि उनकी उमर हो चली थी जिसे भगवान ने बुला लिया उसे कौन रोक सकता है कि उनकी उम्र हो चली थी, जिसे भगवान ने बुला लिया उसे कौन रोक सका है? आदि तरह की विचार को अपने नज़रिये पर थोप कर उस दुख से कभी निजात पाने की कोशिश करते हैं,भूलने की चेष्टा करते हैं. बातें जो भी हों पर जिन्दादिली से अपने नज़रिये को दुरुस्त रखने के लिए नजरिया को नापने तौलने की जरुरत तो रहेगी ही.

- अभिषेक कुमार 
-abhinandan246@gmail.com


***
रंग अभियान
(पत्रिका के नाम एक पुरानी चिट्टी)
दिनांक- २७.०९.२०१४ शनिवार
पिछले काफी समय से मैं सोचता रहा हूँ कि कोई ऐसी पत्रिका हो जो हमें नाट्य संसार साथ-साथ साहित्यिक दुनिया में ले चले.जो हमें अपने संस्कृति, सभ्यता, संस्कार और परम्परा से जोड़े रहे. ऐसी पत्रिका जो हमारी कला प्रतिभा को जागृत करे. हमें ऐसा माहौल दे ताकि हम समाज के बारें में सोचे, उसे संगठित करने विकास पथ पर अग्रसर होने की प्रेरणा ले सकें. रंग अभियान ३४वाँ अंक, स्नेह पात्र संजय कुमार द्वारा १५.०९.२०१४ को मुझे प्राप्त हुआ. स्वाभाविकतः मैं पत्रिका पाकर प्रसन्न हुआ पर मेरी यह प्रसन्नता सामाजिक रूप से कम व्यक्तिगत रूप से ज्यादा थी.
इस पत्रिका के पूर्व आप (संपादक अनिल पतंग जी) की रचना ‘प्रोफ़ेसर सपना बाबू’ की तेइसों कहानियों सहित सभी पत्रों को मैंने पढ़ा. आपके साहित्य और संवादशैली ने मुझे काफी प्रभवित किया. आपके नाम और कम दोनों बेजोड़ हैं. मैं काफी आश्चर्य चकित होता हूँ कि आप जितने सक्रिय रंग मंच में उतने ही प्रिंट मिडिया और वेब मिडिया में भी, अब तो सिनेमा की दुनिया में भी हैं.
यूँ तो मेरी नाट्य और साहित्यिक कुशलता नगण्य है परन्तु कला के विविध रंगों के प्रति मेरी गहरी आस्था और अभिरुचि है. मैं खुद को भाग्यशाली समझता हूँ कि संजय जी के आमंत्रण पर प्रोफ़ेसर सपना बाबू पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में शामिल हो सका. सभी में बेहतरीन बातें सुनने को मिली पर इन सबसे बढ़कर मुझे हिंदी साहित्यिक की जमीनी हकीकत और हालत क्या है इसकी सीख मिली. हिंदी की दयनीय स्थिति से अवगत होकर काफी दुःख हुआ.
 जब मैंने रंग अभियान ३४ के ‘रंग मंच और सिनेमा’ आलेख पढ़ा तो ऐसा लगा मानो नौटंकी के सारे भेद खुल गए. सच पूछिए तो आपके सम्पादकीय आलेख की जितनी प्रशंसा की जाये कम है. अब जरा इस वाक्य पर नज़र डालें जिसमें आपने लिखा है “दो चार नाटकों में अभिनय मात्र करने के बाद वे बहुत बड़े निर्देशक सॉरी डायरेक्टर (अंग्रेजी शब्द जरा वजन बढ़ा देता है) समझते है.” भला इन वाक्यों को पढ़ कर इन बातों को भली भातीं अनुभव करते हैं. ऐसे अनेकों उदारहण प्रस्तुत किये जा सकते हैं.
पत्रिका के विभिन्न स्तंभों जैसे साक्षात्कार, स्मृतिशेष, नाट्य लेख एवं हलचल आदि सभी संतोष प्रद हैं. लोक एवं नाट्य कला की स्थिति विषम है. साथ यह भी डर है कि सामाजिक, सांस्कृतिक परम्पराएँ कहीं विलुप्त ना हो जाये क्योंकि वैश्वीकरण और आधुनिकता की आंधी से थमने वाली नहीं है. लोग देशी चीजों को उतना महत्व नहीं देते. उन्हें दूर का ढोल सुहाना सुहाना और घर की मुर्गी दल बराबर लगती है. देशी कलाकार हो या दर्शक सभी फ़िल्मी और टीवी सिरयलों की तरफ रुख करते हैं. इसके दो कारण हो सकते है- पहला नौटंकी आम लोगों तक पहुँच नहीं पा रही और दूसरा नौटंकी क्या है, इसे किस रूप में लें. ज्यादातर लोग इसे समझ नहीं पा रहे हैं.

ऐसे में अतुल जी जैसे कलाकार ही सजग प्रहरी की भांति लोक कला के ध्वज को सँभाले हुए हैं. ऐसे ही महानुभावों के सत्यप्रयासों से नाट्य एवं कला क्षेत्र का कायाकल्प हो रहा है. लोग उनके कार्यों को समझने लगे हैं. परिस्थिति बदल रही है. लोक कलाकारों को सम्मान मिल रहा है.

अतुल यदुवंशी जो इलाहबाद के भारतीय कला महा संघ के अध्यक्ष हैं. इनके साक्षात्कार आलेख ने मुझे प्रभावित किया. “समाज,सुधारक बड़े-बड़े ऋषि मुनियों द्वारा व्यवहार परिवर्तन मूल्यों और आदर्शों के प्रति स्थापन के लिए लोक नाट्यों का प्रयोग किया जाता था.ना कि नाच का जिसे आज तथाकथित रसिक लोग इसमें ढूंडते हैं” देश और समाज को सही दिशा देने एवं उन मूल्यों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचने का एक हथियार के रूप में लोक कलाओं का प्रयोग किया जाता रहा है. इनके द्वारा कहीं ये बातें बेहद महत्वपूर्ण हैं.

मेरी दृष्टि में रंग अभियान के फायदे और उद्देश्य-
लोगों में सामाजिक के गलत – सही चीजों के प्रति जागरूकता पैदा होती है. वे समाज और साहित्य से जुड़ते हैं. लोगों में एकता और शिष्टता का विकास होता है.लोग अपने कर्मों और विचार के प्रति सजग होते हैं. रंग कर्मियों, रंग प्रेमियों को एक मंच प्रदान करती है ताकि वे अपने विचारों को रख सकें, प्रस्तुत कर सकें. साहित्यकारों, नाट्यकारों, निर्देशकों आदि को प्रेरित करती है उसके कार्यों को चिन्हित करती है उनकी कुशलताओं को निखारती है उसकी रचनाओं को सहेजती है ताकि वर्तमान के साथ साथ भूत और भविष्य दोनों सुधरे. नाट्य विधा का प्रचार- प्रसार होता है. इसी माध्यम से समाज को समयानुसार सन्देश देता है और इसी माध्यम से समाज को समयनुसार सन्देश देता है उसे वर्तमान समस्याओं से रूबरू कराता हैं. उसका हल ढूंढने का उपाय बताता है.कहाँ क्या कार्यक्रम हो रहा है? कौन कौन से कलाकार और निर्देशक शामिल हैं? नौटंकी या नाट्य मंचन किस विषय से जुड़ा हुआ था? इस तरह की तमाम ख़बरों से पाठक अवगत होते हैं. पत्रिका को पढ़कर अनेकों विचार मिलते है जिन्हें भविष्य के कार्यसूची में शामिल करना आवश्यक होता है. भविष्य के विकास कार्यक्रम को और अधिक सुचारू तरीके से कर पायें. इसके लिए मानव संसाधनों की पूर्ति करने में सहायता मिलती है. नाट्य क्षेत्र का तो विकास होता ही है साथ साथ पारंपरिक कलाओं का संरक्षण संवर्धन भी होता है.
तीन तरह के लोग होते हैं. पहला जो सिर्फ सोचते हैं कि ऐसा करना चाहिए पर वे करते भी है पर कुछ कमियों की वजह से सम्पूर्ण नहीं कर पातें यानि संघर्ष करते हैं तीसरा जो सोचते है और सफलता उनके क़दमों में होती है. इन तीनों तरह के लोगों को रंग अभियान प्रेरित,प्रोत्साहित और प्रतिष्ठित करती है. जिस प्रकार प्यासे को पानी चाहिए, उसी प्रकार जिज्ञासु पाठक को पत्र पत्रिका चाहिए. पाठकों को जितनी मात्रा में पाठ्य सामग्री चाहिए, रंग अभियान इसके लिए पर्याप्त है.
साक्षात्कार स्तंभ में आपकी प्रश्न शैली संतुलित और सहज है. अभिनेत्री उमा झुनझुनवाला के विचार और व्यक्तित्व बेहतरीन हैं. धरोहर के अंतर्गत नाटकार आबुर्जोफ़ और मोहन राकेश के विचार विमर्श को रंग मंच और नाटक पर सफल ऑपरेशन कहा जा सकता है क्योंकि रंगमंच से जुड़े लगभग जितने भी अंग है उनका बारीकी से जाँच- पड़ताल कर उन्हें प्रस्तुत किया जा सकता है.
समकालीन रंग परवेश और नाट्य सौन्दर्य नमक आलेख जो डॉ. लव कुमार लवलीन द्वारा लिखा गया है. इसमें भीष्म सहनी के नाट्य रचनाओं की काफी विस्तृत चर्चा की गई साथ ही साथ उनके व्यक्तित्व, रचना प्रक्रिया सृजनात्मक दृष्टि संवेदनशीलता को काफी गंभीरता से परखा गया है और अध्ययन किया गे है. तेईस पेराग्राफों से सुसज्जित यह आलेख किसी भोज पर मिलने वाले गरिष्ठ भोजन से कम नहीं है. आलेख से पता चलता है कि लेखक के पास शब्द भंडार की कोई कमी नहीं है.
यहाँ संक्षिप्त रूप से इस आलेख के बारे में यही कहा जा सकता है कि नाटक की आत्मा, प्रकृति और सौन्दर्य को समझने समझाने का प्रयास सराहनीय और संतुष्टि दायक है.
अनिल पतंग बाबू अपने विचारों को जिस सरलता से रखते हैं, वह अन्यत्र कम ही देकने को मिलता है. उक्त बातें उनके नाट्यालेख “नाटक का भविष्य और भविष्य का नाटक पढ़ कर समझा जा सकता है ” आलेख का अध्ययन मैंने महसूस किया जिस महान उद्देश्य के लिए नाट्य रूपी इन्द्रधनुष की रचना की गई उसे कुछ स्वार्थी तत्व नष्ट करने पर तुले हुए हैं. पहली बात तो ये कि सामान्य जन से नाटक अभी भी कोशों दूर है. गाँव की स्थिति भी इस मामले में छिपी नहीं है. लोग मनोरंजन का मतलब सिर्फ मोबाइल और टी.वी को ही मानते हैं. उन्हें वे नाट्य कला या फिर सांस्कृतिक पारंपरिक नाच गण समय की बर्बादी है. इतना ही नहीं नाटक, नाच, गण आदि को आम जन सिर्फ देख सकते हैं उसमें शामिल होने या उसे अपने जीवन में शामिल करने की जरुरत नहीं समझते. आज की परिस्थिति ही कुछ ऐसी है. हमारे गाँव में जब कभी नाटक का आयोजन तो मुझे अभिभावक से वहां जाने की अनुमति नहीं दी जाती थी. उसमें शरीक होना तो दूर की बात. कक्षा दसवीं के दौरान समझ आया इसमें अभिभावक का दोष नहीं. दोष तो उन धन और पद लोलुप लोगों का है जो शुद्ध मनोरंजन की जगह अश्लीलता परोसते हैं और उसे मसाला कह कर प्रचार करते हैं. अंग प्रदर्शन की आँधियों में बॉलीवुड और हॉलीवुड में तो प्रतियोगिता छिड़ी है. भोजपुरी भी अपने लिक से हटकर, मसालेदार, संवाद, भड़कीले वस्त्र प्रदर्शन आदि फुधार्ता की हड को बखूबी पर कर रहा है. भला इस रंगीन समां में स्थानीय जिसे लोक कला कहा जाता है वो पीछे क्यों रहे?
इस विषम बेला में निराश होने के कुछ नहीं होगा. लोगों की मानसिकता में तभी बदलाव आएगा जब रंग अभियान से हम लोगों को जोड़ पायेंगे.  
बड़ी ख़ुशी होती है जब कहीं सार्थक नाटक पढने सुनने को मिलता है. आशा की किरण दिखती है, जब नाटक के चित्र किसी पत्र पत्रिका में छपे होते हैं. लगता है कि कही न कहीं प्रयास जारी है जिसे और अधिक सुचारू ढंग से प्रत्येक गाँव शहर में फ़ैलाने की जरुरत है. जब लोग अपने गाँव घर की किस्से- कहानियों को सुनने जिसे नाट्य के जरिये देखेगें, जहाँ आज भी साक्षरता दर काफी कम है वहां वे अपने कर्तव्यों अधिकारों के प्रति सचेत होंगे. वे अपनी समस्या का समाधान स्वयं धुन्धने का प्रयाश करेंगे. इन सबके अतिरिक्त नाटक का जो मूल उद्देश्य है मनोरंजन करना वहां सफलता के झंडे गड सकती है. ये इसलिए भी संभव हो सकता है क्यों कि हर गाँव में तो सिनेमा हॉल है नहीं. पर सामुदायिक भवन एवं परिसर जरुर होता है. बस छोटा सा क्षेत्र ही नाटक – नौटंकी के लिए पर्याप्त है. जहाँ तक छोटे – बड़े शहरों की बात है वहां के भी दर्शक रियल्टी शो ज्यादा देखना पसंद करते हैं. जरुरत है तो बस निरंतरता और सुव्यवस्था की. यह तभी हो सकता जब रंग अभियान से जुड़े तमाम लोग नारकर साहित्यकार नाट्यकर्मी मंच कर्मी निर्देशक अभिनेता एवं विभिन्न कलाकार व्यवस्थापक सभी अपने क्षमता नुसार प्रयास कर सकते हैं. नाट्य एवं कला संस्थाएं विभिन्न उप संस्थाएं स्थापित कर कार्यक्रम को आगे बढ़ा सकते हैं.
अंत में इस विषय पर मैं यही कहना चाहूँगा कि नाटक परंपरा और प्रगति दोनों को साथ लेकर चलें. नाटक के मंचन को अधिक से अधिक प्रभावी बनाने का प्रयास किया जाये. उसे विभिन्न प्रतीकों, प्रतिबिम्बों,प्रकाशों, ध्वनियों और सज सज्जा सहित तमाम तकनीकों का उम्दा इस्तेमाल और विभिन्न प्रयोग किये जाने की जरुरत है. सार्थक और नए प्रयोग तभी हो सकते हैं जब तक अपनी प्रतिभा को बढ़ाया जाये और जो प्रतिभा वान हैं वे फ़िल्मी पर्दे की तरफ मुड़े जरुर पर रंग मंच को कभी न भूलें.


- अभिषेक कुमार
abhinandan246@gmail.com
***
   



मंगलवार, 27 सितंबर 2016

बेगुसराय के बिल्लू बार्बर



बेगुसराय के बिल्लू बार्बर


सैलून, जहाँ कैंची और म्यूजिक दोनों साथ साथ एक ही लय में चलते हैं. जहाँ नए - नए आशिक और प्यार में धोखा खाए मजनुओं की मजलिश लगती है. जहाँ कुछ राजनितिक बहसें भी उस्तुरों की भांति कभी कभी लोगों को नुकसान पहुंचाती है. उस मजलिश के अध्यक्ष और कोई नहीं, हाथों और जुबान दोनों से कैंची चलाने वाले गुमनाम शख्स सैलून मास्टर होते हैं. यहाँ हर तरह केश की सुनवाई की जाती है और मुक्कमल हल भी आपको मिल सकता है. हेयर डिज़ाइन करवाना हो या सिरदर्द कम करना आप सैलून की तरफ रुख कर सकते हैं.

जाने से पहले पेश है बातचीत के कुछ अंश...



(सैलून में इंट्री लेते हुए)

मैं- “क्या हाल है? फुर्सत में हैं ?”

बिल्लू - “बिलकुल फुर्सत में हैं. अभी तक तो ठीक ही आप सबके कृपा से.....”

यहाँ गौर करने वाली बात है कि सन्डे को सारा सैलून व्यस्त हो जाता है. उनके कहने का मतलब - बीजी इज इक्वल टू फुरसत.

शीशे के सामने, फिटकरी के बगल में रखे Nokia 1st gen का वो मोबाइल फोन घरघराने - थरथराने (vibretion
) लगता है.

बिल्लू फोन उठाते ही कहते हैं- “हेल्लो”, हाँ कुछ सुनने के बाद हाँ जी. हाँ बिलकुल फ्री हैं आइए. हाँ... हाँ.....

सब हो जायेगा. आइए तो......; हाँ तो कितनी देर में आ रहे हैं? क्या. एक घंटे में. ठीक .ठीक है. फोन पुनः यथा स्थान रख दिया जाता है, बाल के छोटे-छोटे टुकड़ों से सने हाथों द्वारा.



मैं- “ये कब का फोन है? नया क्यों नहीं लेते?”

बिल्लू- “महाराज ! हम गरीब लोग. आपके ऐसा एंड्राइड कहाँ से आएगा.”

मैं- “सैलून इतना चमक रहा है तो फिर एक चमकने वाला फोन रखिए. इतना तो सस्ता- सस्ता मोबाइल मार्केट में मिल रहा है.”

बिल्लू- “जी आप सही कह रहे हैं. मुझे इस मोबाइल से प्यार है. ये मेरे साथ तभी से है जब मैंने इस सैलून की शुरुआत की थी.”

मैं- “क्या बात है. बहुत बढ़िया. क्या आप काम से कभी उबते नहीं हैं?”

बिल्लू- “नहीं, बिल्कुल नहीं उबता. हाँ जब बैठा रहता हूँ तो उब जाता हूँ.”

मैं- “आप कितने पढ़े- लिखे हैं? क्या फेसबुक यूज़ करते हैं?”

बिल्लू- “मेरे पास आपके तरह मोबाइल कहाँ है जो फेसबुक यूज़ करेंगे. एक साल पहले एक लड़का बना दिया था मेरा account पर नहीं पता उसका passward.”

मैं- “आप पढाई कितने तक किये है?”

बिल्लू – “सरकारी स्कूल . पांचवी पास फिर मन नहीं लगा. कलम चलाने में सो कैंची पकड़ लिए.”

मैं- “तो अखवार मंगाते क्यों हैं?”

बिल्लू- “थोड़ा बहुत पढ़ लेता हूँ. हीरो हिरोहीन की फोटो देख लिया हो गया.”

मैं- “आप तो बाल बड़ा अच्छा काट लेते हो ? किसी बड़े आदमी का बाल काटें हैं?”

बिल्लू- “जी हाँ. सपने में, कहा था एक बार शाहरुख़ खान का.”

मैं- “तो मुंबई क्यों नहीं गए?”

बिल्लू- “जाता पर मेरी शादी हो गई. फिर दो बच्चे. बूढ़े माँ- बाप. तो इन जिम्मेवारियों को पूरा करता था सपनों को.”

अब आखिरी सवाल मैंने चुटकुले और रोमांचक ढंग से पूछा.

मैं- “एक लड़की थी दीवानी सी. बहुत प्यार करती थी मुझे हमेशा फोन किया करती थी. पर दो माह से उसका फोन आना बन्द हो गया है क्यों...”

बिल्लू- “हँसते हुए. फँस गई होगी साली दुसरे के साथ.”

उनके रिएक्शन सुनकर मैं हंसने लगा.

दोस्तों ! हमारे मकान में जैसे नींव होती है. वैसे ही पेपर वाला, दूध वाला,चाय वाला, बार्बर, कोब्लर या चाहे फूटपाथ पर गुपचुप बेचने वाला शख्स ये सब ही हमारे सामाजिक ढांचे के महत्वपूर्ण इकाई और नींव हैं. अगर हम इनके काम को सम्मान नहीं देंगे. तो इनका कभी उत्थान नहीं होगा. और जिस समाज का निचला हिस्सा जितना उन्नत होता है वह समाज उतना ही सभ्य, सम्पन्न और समृद्ध होगा.

हम बड़ा काम नहीं कर सकते लेकिन बड़े काम करने वाले छोटे छोटे लोगों के साथ हम अपना वर्ताव तो सही कर सकते हैं. उन्हें कम से कम एक स्माइल तो दे ही सकते हैं सेल्फी के बहाने.



***

Facebook

फेसबुक

बोलना जरा संभल के,
ये जंग का मैदान है.
कोई भी; कुछ भी बोल देता,
क्या बकवास बातों का ये खदान है?

कर दो पोस्ट कोई,
ये बहुत बड़ी दिवार है.
हर आदमी पर  है देखो,
एक धुन सी सवार है.

 ये जोडती है सबको,
सारे देशों की, ये एक किताब है.
कोई भी हो समस्या तुम्हें,
यहाँ हर सवाल का जवाब है.

जिन्दगी एक सफ़र है तो,
ये सबसे बड़ा प्लेटफ़ॉर्म है.
यहाँ इश्क है, यहाँ प्रेम है.
कोई कूल है, तो कोई वार्म है.

ये विद्वानों का संसद है,
तो मित्रों का अड्डा है.
लाइक्स से मिलती खुशियाँ,
ना जाने ये कैसा फ़ायदा है?

ये दुख की; ये आनन्द की,
हर समय की, ये अभिव्यक्ति है.
जब शस्त्र नाकाम है,
तो ये सबसे बड़ी शक्ति है.

- अभिषेक कुमार
abhinandan246@gmail.com



रविवार, 18 सितंबर 2016

गुब्बारा

गुब्बारा(बेचने वाली वो लड़की)
           
किसी का इंतजार करना बड़ा उबाऊ सिचुएशन होता है.ऐसे टाइम को पास करने का सबसे आसान तरीका है अपनी आँखें मोबाइल स्क्रीन पर गड़ाते हुए ऊँगली फेरते रहिए, लेकिन मेरे पास विकल्प नहीं था. मेरा मोबाइल फोन बैट्री ख़त्म होने का संकेत दे रहा था. मेरे लिए ये पल पकाऊ (irritating) था, पर रोचक (interesting) और यादगार (memorable) कैसे बन गया आइए सुनाता हूँ.इस स्टोरी को सुनाने की वजह यह भी है क्योंकि this scene is my first meet with a unknown girl.”

हवा में लहराते हुए रंग बिरंगे गुब्बारों का गुच्छा जो उड़ना चाहती है. एक पल तो लगता है बस अब उड़ने ही वाली किन्तु नहीं. पतले से धागे जो कभी दीखते है कभी नहीं, मदमस्त गुब्बारों को ठीक उसी तरह बांधे हुए है जिस तरह गरीबी उस मासूम सी लड़की को बांधे हुए है. वह मायूस सी लड़की फीकी सी मुस्कान लिए अपने हाँथों से गुब्बारों को सम्भाल रही है. वह उन गुब्बारों को इधर-उधर बहकने से बचा रही है, यह सोचते हुए कि कहीं गुब्बारा फूट ना जाये. अगर एक गुब्बारा फूट गया तो 10 रु० और मम्मी की मार अलग से. ना जाने कितने ख्याल कितनी बातें उसे उलझाये जा रही थी, बिल्कुल उस उलझे- बिखरे हुए बालों की तरह जो उसके सिर की शोभा बढ़ा रही है. शायद दो वक्त किसी तरह कुछ भी खाने को मिल जाये इसी जद्दोजहद को जिन्दगी कहते है शायद, उसके चेहरे यही बयां कर रहे हैं. 

वह हरे और लाल फूल वाले पैटर्ननुमा, धुल से सनी फ्रॉक पहनी हुई है, जिसके एक- आध जगह सिलाई खुले हुए हैं. कभी कभी वह दाएं हाथ से जो गुब्बारों का गुच्छा पकड़ी हुई बदल लिया करती थी अनायास ही उसकी उँगलियाँ उस फटे हुए भाग चले जाती, धुंधले मन से ये सोचते हुए कि काश उसके कपड़े सिले हुए होते. इधर- उधर चक्कर लगा कर मॉल की लम्बी –ऊँची सीढियो पर बैठ जाती है.इस इन्तजार में कि कोई आये और उसका गुब्बारा खरीद ले. सीढ़ियों पर मॉल में आने-जाने वाले ग्राहकों का ताँता लगा हुआ है.कोई उस तरफ देखता भी है तो कोई देखना भी नहीं चाहता. किसी को फुर्सत नहीं तो किसी को फ्री में सबकुछ चाहिए. एक ग्राहक गुब्बारे की तरफ आ ही रहा था कि वो लड़की खड़ी हुई किन्तु क्या मन में आया वह ग्राहक भी चलता बना.

इस शोरगुल और आवजाही में वह मौन होकर कभी चारों तरफ देखती रहती.फिर कभी बैठे- बैठे अपने गुब्बारों को अपनी आँखें उठाये निहारती रहती. उसकी आँखों में गुब्बारे का प्रतिबिम्ब पड़ते ही वह चहक पड़ती, मुस्कुराने लगती और मीठे स्वर में कहने लगती “गुब्बारा ले लो..., गुब्बारा......”

“कितने का है एक” ये आवाज सुनते ही वह लड़की पीछे मुड़ी. आवाज देने वाली महिला के पास जाकर कहती है “10 रु०”. ग्राहक महिला अपने साथ खड़ी 5 साल की बेटी से पूछी- “कौन सा बेलून चाहिए मेरे बेटे को?”

प्यारी सी बच्ची ने लाल गुब्बारे की तरफ ऊँगली से इशारा करते हुए कही “वो”. उस लाल बेलून का धागा अपने बेटी को पकड़ाते हुए अपने भूरे पर्स से रूपये निकालने लगी. 

गुब्बारा बेचने वाली लड़की, उस बच्ची को गुब्बारे से खेलती हुई ना देखकर उसके फ्रॉक को देखती है शायद वह ये सोच रही है कि काश मेरे पास भी उसके जैसा फ्रॉक होता. उस लड़की की मुखाकृति को देखते हुए सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि कितने अंतर्द्वंदों को वह मन ही मन झेल रही है. उसका एक मन उसे अच्छे कपड़े ना होने का एहसास दिलाता है तो दुसरे ही पल उसके पास एक नहीं ढेर सारे गुब्बारे होने की खुशियों का झांसा दिलाता है. 

“कहाँ देख रही है, ये लो 10 रु०” वह महिला पैसे थमाते हुए कार में जा बैठती है. कार आगे बढती चली गई, जिसकी खिड़की से वो बलून निकला हुआ था.

“कितना खुबसूरत लग रहा है ना भैया; लेलो तुम भी एक” वहीँ वाईक पर सवार एक जवान व्यक्ति से वो लड़की आग्रह करती है.

उस व्यक्ति के पीछे एक लड़की बैठी है मालूम पड़ता है उसकी गर्लफ्रेंड होगी. “ले लो ना जानू! कितना प्यारा है गुब्बारा.”गर्लफ्रेंड ने नखरीले टोन में उस व्यक्ति से कहा.

“तुम भी हद करती हो, क्या करोगी गुब्बारे का ? ”- व्यक्ति बोला.

“मैं अपने बेड रूम में लगाउंगी”- गर्लफ्रेंड ने जबाब दिया.

“ये लो. दिल वाला, इसके 20 रु० लगेंगे”- गुब्बारा बेचने वाली लड़की ने कहा.

(मुझे आश्चर्य हो रहा था,ये सोच कर कि एक गुब्बारे बेचने के लिए कितने ग्राहकों को झेलना पड़ता है)

“नहीं चाहिए. ये सब तुरंत फूट जाते हैं, फिर क्या फ़ायदा.” बाइक पर सवार वह व्यक्ति मुँह फेरते हुए कहा.

“नहीं फूटेगा, ये गुब्बारा अच्छा वाला है ”- लड़की बोली.

“फूट गया तो”- व्यक्ति ने कहा

“फूट गया तो और भी मज़ा आएगा”- लड़की बोली (हँसते हुए)

इतना सुनते ही उस व्यक्ति की गर्लफ्रेंड जोर-जोर से हँसने लगी.... और कही –“एक काम करो मुझे अपना सारा बलून मुझे दे दो ”

अचानक मेरा फोन vibrate हुआ.पॉकेट से मैंने मोबाइल निकला. स्क्रीन पर लिखा आ रहा था “unknown no Calling........”

मैंने फोन रिसीव करते हुए कहा “हेलो.....” .

उस गुब्बारे बेचने वाली लड़की को मेरी नज़र खोजने लगी पर शायद वो कहीं जा चुकी थी.

उधर से भी मुझे रिप्लाई मिला- “हेलो.” आवाज पहचानते हुए मैंने पूछा- “तुम कहाँ हो, मैं मॉल के सामने तुम्हारा एक घंटे से वेट (wait) कर रहा हूँ.”

“मैं मॉल के इंट्री गेट के सामने हूँ, ढेर सारा बलून लिए हुए”- वो बोली

“अच्छा वो तुम्हीं हो”- मैंने कहा.

उसके पास जाकर मैंने उससे पूछा ये व्यक्ति जो अभी गया कौन था ?

“वो....वो तो रिचार्ज वाले भैया थे.” उसने कहा.

“मैंने तो उसे तुम्हारा बॉयफ्रेंड समझ रहा था.आज कल तो दो –तीन बॉय फ्रेंड रखना आम बात हो गई है.”मैंने कहा.

“तुम भी ना.....” वो कहते हुए मेरे साथ मॉल में एंटर कर गई.

आज जब मैं इस कहानी को लिख रहा हूँ तो सोचता हूँ वो गुब्बारा बेचने वाली प्यारी सी लड़की नए फ्रॉक के लिए पैसे इकठ्ठा कर चुकी होगी.



-अभिषेक कुमार 

abhinandan246@gmail.com



सोमवार, 5 सितंबर 2016

अम्बेदकर चौंक
  (ऐसी तस्वीर जो कभी नहीं बदलने वाली)

यूँ तो आपको सभी जिले के शहर में अम्बेदकर चौक मिल जायेगें. अगर अम्बेदकर चौक नहीं होगा तो कचहरी (व्यवहार न्यायालय) चौक तो आपने जरुर देखा होगा. वही कहीं आसपास डॉ. भीम राव अम्बेदकर (संविधान निर्माता) की प्रतिमा मिल जाएगी.ये प्रतिमा मिलना और होना दोनों जरुरी है क्योंकि हम आम नागरिक को, खास लोगों द्वारा बताए गए, महान बातों को भूलने की बीमारी होती है. डॉ. भीम राव अम्बेदकर बाएँ हाथ में संविधान लिए हुए और दायें हाथ से लोकतंत्र के मंदिर (संसद भवन ) की ओर इशारा कर रहे हैं. उनके बढ़ते कदम स्वर्णिम भविष्य की ओर अग्रसर हैं. वे एक महा स्वप्नदर्शी और सच्चे देशभक्त थे जिन्होंने देश को एक सूत्र में पिरोने का सतत संघर्ष करते रहे. वे चाहते थे कि सबको समान मौके दिए जाये और सभी लोगों को सामान अधिकार प्राप्त हो. वे चाहते थे कि सब लोग अपने सामर्थ्य और शक्ति अनुसार संघर्ष करें और देश के विकास में अपना सहयोग दें. ये बातें मुझे स्कूली दिनों में बताई गई थी. उस वक्त मैं सोचा करता था कि अगर सबलोग अम्बेदकर जी के बताए मार्ग पर चलेंगे तो सचमुच देश की तश्वीर बदल जाएगी.

शहर की एक सड़क है जो ट्रेफिक चौंक से अम्बेदकर चौंक होते हुए कचहरी चौंक तक जाती है. ये सड़क वहीँ ख़त्म नहीं होती.किन्तु हम आपको ज्यादा दूर नहीं ले जायेंगे. सड़क के बीचों बीच लम्बी सी दिवाइडर है जो पहले छोटी हुआ करती थी किन्तु जैसे जैसे समय बदलते गए वैसे वैसे दिवाइडर की ऊंचाई भी बढती गई.पता नहीं ये दिवाइडर और कितनी ऊँची होगी. गौर करने वाली बात ये है कि दिवाइडर सिर्फ सड़क को दिवाइडर नहीं करती. ये उन सोसाइटी को भी अलग अलग करती है जो सड़क के दोनों तरफ फैले हुए हैं. एक तरफ स्वर्ण आभूषण,महँगे ब्रांडेड जूते चप्पल की दुकानें और कई बड़े मॉल भी हैं. 

वहीँ सड़क के दूसरी तरफ चार पांच रिक्शा वाला अपने ग्राहकों के इन्तेजार में खड़ा है. आने- जाने वाले राहगीरों को वो तो बड़ी मासूमियत से निहार रहा है किन्तु गरीबी, भूख और धूप ने उसका चहेरा निर्दयी सा बना दिया है. जो की हर किसी को वो घूरता हुआ नज़र आता है. आखिर कौन समझे कि वो भी एक इन्सान है. उसके पास भी दिल है.मैंने कई दफा देखा है मोटी सी महिलाएं या पुरुष रास्ते ऊँचे होने पर भी रिक्शे से नहीं उतरते उलटे रिक्शे वाले को भला बुरा ही सुनाते. आगे बढ़ने पर लिट्टी चोखा वाला दो-चार लिट्टी बनाकर उसपर पंखे झेल रहा है, कहीं उस पर मक्खी ना बैठ जाये. आसपास गन्दगी का ढेर पर कई ठेले हैं. कोई पूरी तरह टूटी हुई, तो कोई खड़े रहने का प्रयास करते हुए, हालाँकि उसके जो पहिए है पूरी तरह नाकाम है. कई तो खुटों से बांध दिए गए हैं.उन ठेलों पर कई तरह की हरी सब्जियां पंक्ति बद्ध सजी हुई है.ऐसा लगता है कुछ सब्जियां ग्राहक के स्वागत गान के लिए खड़ी हैं. और जिन टोकरियों में सब्जियाँ बिखरी पड़ी हैं ऐसा लगता है मानों वे आपस में लड़ रही हैं. और कह रही हैं मुझे ले लो मुझे ले लो. इन सब्जियों को बेचने वाले वो लोग हैं जिन्हें अपना आवास नहीं है वो ठेला ही उनका एक मात्र ठिकाना है आशियाना है. जमीन पर बोरा बिछाए पूरा परिवार सब्जियां बेचने में जुटा है. बगल में ही एक गरीब गर्भवती स्त्री खुले कड़ी धूप में बैठी प्याज और लहसुन बेच रही है. वही छोटा सा अधनंगा 4 या 5 साल का लड़का, शायद उसी स्त्री का पुत्र होगा; जो बार बार ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित करने का असफल प्रयास कर रहा था. उसकी आँखों में एक डर है जो कह रही है प्लीज प्याज ले ना. नहीं तो मुझे भूखा सोना पड़ेगा. एक ग्राहक आया भी तो उस महिला से उलझ पड़ा कहने लगा कम क्यों तौल रही है? तुम लोग कैसी है रे एक प्याज चढ़ने नहीं देती. हाफ पैंट पहने, बाइक पर सवार एक गोरे ने खाली थैला बढ़ाया.थैला भर कर वो प्याज बेचने वाला जिससे थैला बड़ी मुश्किल से उठ रहा था.वो गोरा व्यक्ति पैसे उस बच्चे को सौ का नोट दिया और कहा चल जल्दी से छुट्टा ला. 

आप सोच रहे होंगे मैं वहां क्या कर रहा था. श्री मान ! वहाँ से कुछ ही दुरी पर एक चाय की दुकान है. बढ़िया चाय बनता है. आगे तो आप समझ ही गए होंगे मैं कड़ी धूप में वहां चाय तो नहीं पी रहा होउगा. मेरे हाथों में मेंगो फ्रूटी ही होगा. खैर, मोल भाव करने वाले वो लोग हैं जो रेस्टोरेंट में 500 रु एक वेटर को देने में नहीं हिचकते.चलिए उस प्याज वाली के बगल में एक बूढी औरत बोरे और थैले से भुट्टा निकाल रही है. शाम होते ही उसका गरमा गरम भुट्टा बिकने के लिए तैयार हो जायेगा, किन्तु भुट्टा पकाने के पहले सारा इंतजाम करना पड़ेगा ना. सो वो चूल्हे में कोयला डाल रही है साथ ही दमघोटू धुंए से जूझ भी रही है.सोचता हूँ क्या जरुरत आ पड़ी इस बूढी को भुट्टा बेचने की. क्या इसका बेटा इन्हें छोड़ अपनी पत्नी के साथ कहीं चला गया है या फिर इसे घर से निकाल दिया गया है.

दुसरे दिन की बात है. मॉल के ठीक सामने. रोड के दूसरी तरफ, भुट्टे वाली सब्जी वालों के कतार में ही. मैं अपने एक मित्र के आग्रह पर उसकी प्रतीक्षा कर रहा था. ठीक वहीँ पर एक मोची बैठता है.जूते चप्पल रिपेयरिंग करता है.मैंने देखा कई लड़कियां जो पेंसिल हिल वाली सेंडिल में काँटी ठोकने के बाद उस मोची को इसलिए भला बुरा कह रही थी कि उसने 10 रु ज्यादा मांग लिए. मैं पूछता हूँ क्यों. आखिर क्यों हम लोग ऐसी आदत के शिकार होते जा रहे है कि सिर्फ और सिर्फ अपने ही बारें में सोचते हैं. अपने थोड़े से लाभ के लिए दुसरे से लड़ते रहेंगे. जरा सा कुछ हुआ नहीं कि बेवजह तमाशा बनाना इस दौर का शगल हो गया है. तुनक मिजाजी मानसिकता जिसे मेंटल वार्मिंग नाम दिया जा सकता है, हमारे ऊपर हावी होता जा रहा है.

वो मोची वाला शायद सही कह रहा था ac ऑफिस में बैठने वाले लोग कब समझेंगे कि सड़क के किनारे धुल और धूप फंखाते हुए काम करने की क्या कीमत होती है. 



***

C-7a: Pedagogy of social science [ B.Ed First Year ]

1. माध्यमिक स्तर पर पढ़ाने के लिए आपके द्वारा चुने गए विषय का क्षेत्र क्या है ? उदाहरण सहित व्याख्या करें। माध्यमिक स्तर पर पढ़ाने के लिए हम...