रविवार, 25 फ़रवरी 2018

वेलेंटाइन दिवस
14 फरवरी 2017 
वेलेंटाइन डे मतलब सबके लिए अलग-अलग हो सकता है किन्तु समांतया कुछ वर्षों से प्रेम दिवस, प्रणय दिवस के रूप में प्रथा ज़ोरों से चल पड़ी है। इस दिन कुछ गृहस्थ लोग मातृ पितृ पूजन दिवस के रूप में मनाना चाहते हैं। तो वहीं देश भक्त जन ने इस दिन शहीद दिवस के तौर पर भगत सिंह को श्रद्धांजली देते हैं। इसे आधुनिक युग में इस पर्व को बाजार की तरफ से वेलेंटाइन डे के तौर पर ज्यादा तवज्जो दिया जाता है। टीवी और सोशल साइट्स पर तो इस प्रेम दिवस के बारे में कहना ही क्या। वो तो आप पहले से अवगत हो ही।
मेरी मानें तो इश्क़ से बढ़कर देश भक्ति का नशा अच्छा है। कम से कम शान से जीना तो आ जाता है और शहीद होना, ये तो सिर्फ सौभाग्य की बात है; और रही प्रेम की बात तो यथार्थ यही है कि जगत में माता-पिता के प्रेम से बढ़कर कोई प्रेम नहीं हो सकता है। बाकी तो सारे प्यार कि बातें हैं वो भी खोखली और झूठी । हालांकि इतना सभी जानते है और मानते भी। किन्तु एक  सत्य यह भी है कि ज़्यादातर युवा व वयस्क फिल्मों के प्रेमी जोड़े को देख कर उन्हें रियल लाइफ में भी अप्लाई करना चाहता है।
            रसिया लोग इस पर्व को मनाना चाहते हैं पर चोरी छिपे । उनका मानना है ये प्यार का पर्व है। आशिक़ी का उत्सव है। दिल वालों के लिए प्रेम प्रकट करने का महोत्सव है, जिसे पूरी विधि – विधान से मनाने का रिवाज है। इस पर्व के जानकारों के अनुसार हर दिन एक खास आइटम व आजमाइस का प्रावधान है। पेमी – प्रेमिका किसी भी सूरत में हो ऐसे दिन नहीं भूलते और पूरे साल कि कसर इस सप्ताह में निकाल देते हैं। उनका फिल्मी रोमांस में अपार श्रद्धा होती है जिसे बड़े भाव से हकीकत से रूबरू होते हैं।  आखिर उनकी सब्र का इम्तेहान भी तो है, और दोनों तरफ से इसकी तैयारी में लंबे अरसे से हो रही थी। ऐसे महान पर्व में कई तरह कि कहानियाँ बन भी जाती है और कोई कहानियाँ बनाने चूक जाते हैं। जो चुके वो समझो बहती गंगा में हाथ धोने से रहे। क्योंकि भाई प्यार करने के लिए जिगर चाहिए। बजरंग दल और न जाने कितने तरह के दलदल; प्रेमी-जोड़ो पर कीचड़ उछालने कि जुगत में रहते हैं। बड़े घबराए हुए से प्रेत्येक प्रेमी जन प्रतीत होते हैं। कि कहीं उन्हें देख न लें कोई। कई तरह के व्हात्सप्प विडियो वायरल हुए है जिसमें प्रेमी की पिटाई हो रही है। जहां ये पिटाई कार्यक्रम चल रहा होता है। वह लगे हाथ दूसरे लोग भी अपना हाथ आजमाने से नहीं चूकते और मीडिया की क्या जरूरत । आज के डेट में तो सारे सिटिज़न एक जुर्नलिस्ट हैं सो अपना स्मार्ट फोन से लगे फोटो और विडियो बनाने और एक सेकेंड नहीं हुआ वायरल हो गया। इस तरह आधुनिक काल की परिस्थितियों को सेल्फ़ी सभ्यता और वायरल संस्कृति से नवाजा अतिशयोक्ति नहीं होगी।

बॉय फ्रेंड बनने की अनिवार्य शर्त यह है कि पॉकेट गरम होना चाहिए और बाइक तो पान के साथ ज़र्दा का काम करता है। ऐसे लड़के अक्सर लड़कियों को बेवकूफ समझने कि भूल कर बैठते हैं। कई दफे लड़कियां भी ऐसी गलतियाँ कर देते हैं। सारे के सारे लोग अपनी गोटी सेट करने कि फिराक में रहते हैं। लड़की दिखी नहीं की पूरी जिन्दगी के सपने एक पल में देख डाले। लड़की पट भी गई। माने गोटी सेट भी हो गई। और फिर लगे एक दूसरे को आबाद करने। ये खयाल ही नहीं रहता कि कौन किसको यूज कर रहा है। जो भी हो बड़ा इंट्रेस्टिंग सा खेल बन जाता है। बॉय फ्रेंड और गर्ल फ्रेंड बनाने और झलने के दौरान। लाइफ से किसी के किसी वजह से चले जाने आत्म ज्ञान होता हुआ मालूम  पड़ता है।

देखिए आप प्रयास करते रहिए, इसमें कोई हर्ज नहीं मगर किस्मत और वक्त अपना काम करते रहेंगे। आशा करना, सब्र करना, प्यार के सपने देखना, मन ही मन चाहना, प्यार कि बातें कहना सुनना देखना, ये सब अच्छा है, बहुत अच्छा है। इतना सा चलेगा। वरना सुनने में तो बहुत कुछ आता है। जैसे प्यार का एक उफान आया और फ़ोरन उतर भी गया। और इसका परिणाम । सब कुछ खो बैठे। नींद, चैन, वक्त रुपए, आजादी, सब कुछ जो अपना था वो सब गिरवी रख दिया। क्योंकि प्यार का मतलब ही होता है – देना और सिर्फ देना।
फिल्मी गानों से तो आप वाकिफ ही होंगे। ज़्यादातर विद्यार्थी जिनके कानों में ईयर फोन लगे रहते हैं। अगर ईयर फोन  नहीं तो समझ लीजिए। वह पक्का प्रेमी नहीं है। हाँ पढ़ाकू हो सकता है। इन गानों का असर इतना हो गया है कि हर क्लास के बच्चे किसी अभिनेताओं के अनुयायी अवश्य होंगे। और उन्हीं कि तरह अपनी जोड़ी किसी के साथ लगा रखते हैं ये अलग बात है कि एक तरफा होता है अकसर।  कोई इसे जाहीर कर देता है तो कोई त उम्र नहीं करता। किन्तु बुढ़ापे तक इस वालेंटाईन दिवस के प्रति एक अबूझ और अतृप्त लालसा बनी रहती है। वो पुराने खत या तस्वीर जरूर निकाल कर याद ताजा करते हैं।
अंत में एक प्रश्न रख रहा हूँ- आज प्रेम –प्रसंग की जगह अंग- प्रत्यंग पर ध्यान ज्यादा दिया जा रहा है? मन की बजाय तन को क्यों प्राथमिकता दिया जा रहा है? सच्चा स्नेह के बजाय वासना और तृष्णा में ही सारे प्रवृत्त हैं, क्यों?
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लेखक और लेखन की चुनौतियाँ



लेखक  और  लेखन  की  चुनौतियाँ


किसी फिल्म का पोस्टर कहने के लिए पर्याप्त है, उस फिल्म की कहानी, उस कहानी के भाव, उस कहानी के दृष्टिकोण, मानसिक स्थिति और अन्तः परिस्थितियाँ.

प्रश्न ये है कि हम जो जिन्दगी जी रहे हैं उसमें से कहानी कैसे निकालें ? उस कथाअंश के द्वंद की पहचान कैसे हो? कहानी का यथार्थ भाव क्या हो? जिन परिस्थितियों और कालखण्ड में वे संघर्ष कर रहे थे. या कर रहे हैं उनकी वास्तविक समस्या क्या है? वे किन वजहों से स्वयं को या स्वयं के वातावरण से प्रभावित हो रहे या कितना प्रभावित कर रहे हैं? किसी कहानी या चित्रण का मूल मकसद यही होना चाहिए।
चित्र और शब्द दोनों दो चीज है पर दोनों की आत्मा मानो एक ही है। दोनों की  रचना प्रक्रिया चुनौती पूर्ण है। चित्र बिना कुछ कहे बहुत कुछ कह देता है। शब्द अपनी शक्ति से ऐसे चित्र की रचना कर देता है कि पाठक मंत्रमुग्ध हो जाता है और बिना शब्द के उक्त बातें या भाव चित्र के माध्यम से कहना असंभव लगता है. इस लिए चलचित्र सर्वोत्तम उपाय हो जाता है किसी भी कहानी को कहने का . संवाद और चेहरे के भाव यही बहुत हैं कहने को.  

 फिल्मों से जुड़े सवाल- जवाब
एक बार मैं फिल्म देखने बैठा, मन में सवाल उठा। फिल्म बनाने का मतलब क्या हो सकता है ? इसकी क्या वजह हो सकती है। सबसे बड़ी वजह।
हालांकि मेरे पास कई जवाब हैं । किसी डाइरेक्टर के लिए। अपनी कहानी । अपने अनुभव । अपना जुनून । बस, इतना ही। और कुछ नहीं क्या। मेरे खयाल से एक चित्रकार जो कूची और रंग से चित्र बनाता है। उसे पता होता है कि कहाँ कितना रंग डालना है और क्यों ? और भी बहुत सी बातें कहाँ कौन सा रंग सबसे सटीक तरीके से भरा जाए जिसे वह दिखाना चाह रहा है बनाना चाह रहा है।
फिल्म निर्माण एक उम्दा माध्यम है। विचार को व्यक्त करने का। पर इसमें वही उम्दा काम कर सकता जिसे सब कुछ का उम्दा ज्ञान हासिल हो या उसे उम्दा ज्ञान रखने वाले व्यक्ति की परख हो तभी वह सभी माध्यम जैसे आडिओ, विडियो, कैमरा, स्पेशल इफैक्ट, कॉस्ट्यूम, मनजेमेंट आदि का सम्पूर्ण ज्ञान रखता हो। इसकी अपनी एक अलग ही भाषा होती है।

फिल्मों से अपेक्षाएँ –
·         राष्ट्रीय सरोकार से जुड़ी हो।
·         वर्तमान समस्या की परख हो।
·         रिस्ते की महक हो प्रेमी-प्रेमिका के आलवे ।
·         जमीन से जुड़ा हो मगर कल्पनाशीलता का पुट हो। ना कि कॉपी पेस्ट ।
·         लार्जर देन लाइफ हो मगर आम लोगों की जिन्दगी का आइना

फिल्म के कुछ डाइलॉग जो हमेशा याद किए जाएं –
  • दुनिया में जीतने भी अच्छे लोग होते है वो अपनी गलती मानकर फ़ोरन माफी मांग लेते हैं। दुनिया में जीतने भी अच्छे लोग होते है वो दूसरों के माफी माँगने पर उन्हें फ़ोरन माफी मांग लेते हैं।
  • इस घर का हर एक रिस्ता प्यार की कड़ी से बंधा है चाहे वो इंसान का हो या मालिक या नौकर का हम नए रिस्तों को बनाने के लिए पुराने रिस्तों को नहीं तोड़ते।
  • यूं तो जिन्दगी के सफर में कई आँधी और तूफानों का सामना करना पड़ता है लेकिन मासूम और अनाथ बच्चे की जिन्दगी में एक तूफान और भी हैं इसकी मजबूरी, लाचारी और अकेलेपन का एहसास.

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पहाड़ और प्रगति
               
               पहाड़ छोटा हो या बड़ा हमेशा ही आकर्षण का केंद्र रहा है। पहाड़ प्रकृति का सभी प्राणियों के लिए अनूठा वरदान व अनुदान सा है। सभी प्रकार के प्राणी, अमीर गरीब, साधू- डाकू, प्रेमी – दुश्मन, पशु- पक्षी इत्यादि अपने उद्देश्यों की पूर्ति हेतु पहाड़ की तरफ पलायन करते हैं। अमीरों के लिए पिकनिक स्थल तो गरीबों के लिए दर्शनीय स्थल। साधू के लिए आस्था का केंद्र तो डाकू के लिए शरणस्थली, प्रेमी के लिए क्रीडा स्थल तो दुश्मन के लिए दुर्गम क्षेत्र, पशु के लिए उत्कृष्ट वातावरण तो पक्षियों के लिए सुव्यवस्थित घोंसला।
             
              इस प्रकार हम देखते हैं कि पहाड़ हम सभी प्राणियों के लिए उपयोगी है। या फिर उपयोगी बना दिया गया है। प्रकृति ने जो हमें अनुदान दिया उसे कलाकारों और वास्तुकारों ने उसे सजाया – सवारा तो वहीं हमारे पूर्वजों ने आस्था और धर्म से जोड़ कर, एक नई परम्परा या पर्व त्योहार की शुरुआत की जो वर्तमान और भविष्य में ये परंपरा पर्व त्योहार और मेला में परिणत हो गई। वहीं ऋषि और धार्मिक पुस्तकों के अनुसार उन तमाम पर्वत जो हम आज देख सुन रहें हैं उनका आध्यात्मिक महत्ता जान कर हमें आश्चर्य और हल्की-फुल्की अनुभूति होती है। यहा हल्की – फुल्की अनुभव से मेरा तात्पर्य है, इन प्रतिस्ठानों का बाजारीकरण एवं  धार्मिक अंधानुकरण । धर्म के नाम पर ढोंग व पाखंड । इन सबसे मिलकर आध्यत्मिकता के महत्व को गौण कर दिया है।  जहां धर्म की सही चर्चा। व्याख्या होनी चाहिए वही जान साधारण वेकार की पूजा अर्चना एक छोटे बच्चे के गुड्डे गुड़ियों के खेल के सदृश हो गया है। किन्तु इन सब बाह्य आडंबर के कारण भी हिंदुओं में जो भीतरी आस्था, ईश्वर के प्रति जो भाव है वो कम नहीं है।

                यही हिन्दुओं की विशेषता भी है उन पर कोई भी कितनी भी वाह्य शक्ति आ जाय, पर उस पर पूर्ण रूप से हावी नहीं हो सकता। उनके हृदय की आस्था बेमिशाल है पर मन की संकीर्णता उन्हें जड़ बनाए रखती है। उसे अपने बंधन से मुक्त नहीं होने देती। भारत यकीनन आज भी इतनी गरीबी में जी रहा है जो शहरी आबादी बेतहाशा बढ्ने के वाबजुद भारत आज भी गाँवों का देश है। गाँव के ही लोग नेता हो चुनते हैं। गाँव के युवा ही देश का प्रतिनिधित्व करते हैं किन्तु गाँव की स्थिति आज भी दयनीय है। इसके मूल में शिक्षा की और सरकार की अनदेखी व यहाँ के नागरिकों के दोगले रवैये है। यहाँ के बिचौलिये गरीबों को उठने नहीं देते, यहाँ की स्थिति सुधरने नहीं देते, आज भी सबकी स्थिति लगभग सभी क्षेत्र जैसे सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी में पिछड़ा है। किन्तु बदली सामाजिक स्थितियों एवं विचारों से स्थिति में परिवर्तन की किरण दिखती है पर अभी बहुत कार्य व प्रगति करने को शेष है।      
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पर्वों के बहाने कुछ बातें
27 अक्टूबर 2017 
 आज छठ पर्व का समापन हो गया। पर्वों का भी सिलसिला अब थम गया। गणेश चतुर्थी से जो पूजा का कार्यक्रम शुरू होता है लगातार चलते रहता है। कोई ना कोई व्रत त्योहार का आना जाना लगा रहता है। ये व्रत–त्योहार हमें अपने रंग में रंग कर, एक नये एहसास, एक नयेपन का बोध कराते हुए चले जाते हैं । भारतीय समाज ही ऐसा है जहाँ एक भी दिन कोई विशेष पूजा या अर्चना ना हों । यहाँ सब दिन पूजा–पाठ का कार्यक्रम है पर सबों का उतना महत्व नहीं है फिर भी व्रत त्योहारों की इतनी संख्या है कि लोग काम कम और इन त्योहारों को मनाने में ज्यादा लगे रहते हैं।

            एक तरह से देखा जाए तो ये उत्सव, त्योहार, पर्व आदि बाजार और समाज दोनों के लिए अच्छा है। इन त्योहारों की अधिकता से बाजार में रौनकता बनी रहती है।  अलग अलग त्योहार में अलग अलग चीजों की माँग बढ़ती है। हमारे व्रत त्योहार इस तरह से सजे हुए हैं कि जिस मौसम में जो फल आदि या आहार हमें ग्रहण करना चाहिए बताते हैं। अतः हम कह सकते हैं कि भारतीय समाज के त्योहार की इस तरह से व्यवस्था की गई है कि मानव चतुर्मुखी विकास हो।
               जितने भी व्रत–त्योहार हैं सबमें किसी न किसी देवी- देवताओं के पूजा–अर्चना का विधान है। वे देवता हमारी रक्षा करें। हमारे जीवन को सफल बनावें। वे हमपर अपनी कृपा – अनुकम्पा बनाए रखें। लोग ऐसी मनोकामना और प्रार्थना करते हैं। कृष्णा अष्टमी – भगवान श्री  कृष्ण के पृथ्वी पर अवतरण की पूजा, तो रामनवमी में भगवान राम की आराधना । गणेश चतुर्थी में भाग्य के देवता गणपती की पूजा होती है तो वहीं साल के प्रारम्भ में वसंत ऋतु में माता सरस्वती जो ज्ञान–विज्ञान गीत-संगीत की आधीष्ठात्री हैं, पूजा अर्चना बड़े श्रद्धा भाव से किया जाता है। शिव रात्री में महाकाल देवधिदेव भगवान भोले नाथ की पूजा होती है। यूं तो सावन का महिना उन्हीं को समर्पित है। मार्च का महिना तो रंगोत्सव का है। होलिका दहन का है। होलिका दहन में लोग, पुरानी चीजों और जो कुछ भी जर्जर समान होता है उसे आग के हवाले कर देते हैं। हिन्दू धर्म में प्रकृति के मूल श्रोत्रों की पूजा का विधान है। प्रकृति ही नहीं यहाँ पशुओं और पौधों की भी पूजा होती है।
              हिन्दू संस्कृति में एक बहाव है जो नदियों सा कल कल बहता रहता है। हमारी परम्परा – पर्व – त्योहार उत्सव सब कुछ इस तरह से है हमारे जीवन में शामिल है जैसे इन्द्र धनुष के रंग (ग्राडिएंट ऑफ कलर)|
              ना जाने कितने रंग,  ना जाने कितने देवी देवता, ना जाने कितने उत्सव, ये सब के सब अपने आप में सम्पूर्ण होते हुए भी; एक ही में नहीं रमे रहने की प्रेरणा नहीं देते। समय की तरह हमें भी गतिमान रहना चाहिए।
              मानो वे कहते है कि अपनी मनोवृति परिवृति सब कुछ बदल डालो पर वृत में रहो। चित्त वृत में रहो। चित्त वृत का तात्पर्य भी यही है कि जितनी भावनाएं हैं सब का चक्र पारी पारी से चलता रहता है और इन्सान इसी सब से खुद को उलझा हुआ पाता है पर ये उलझन ही उसके विकास और उन्नति का कारण जरूरत है उसके सही तत्व को पहचानने की। जरूरत है सही दिशा में मस्तिष्क को संलग्न करने की उन विचारों को जीवन में उतार कर परिणत करने की।   

  

मंगलवार, 23 जनवरी 2018

aisi buddhi bana do maa

ऐसी बुद्धि बना दो माँ


व्यर्थ चिंता से रहित
ऐसी बुद्धि बना दो माँ,
करूँ आराधना सदा तुम्हारी,
ऐसी बुद्धि बना दो माँ.

मन अविचल हो सदा हमारी,
हो जाये अगर, वर्षा अंगारों की.
पग अविराम हो सदा हमारी,
हो ऊँचे पर्वत या कतार काँटों की.

 मिट जाये दुबिधा सारी,
ऐसी बुद्धि बना दो माँ,
करूँ आराधना सदा तुम्हारी,
ऐसी बुद्धि बना दो माँ.

हो वायु सुगन्धित, हरिभरी ये धरती सारी,
जीवन का हर दिन, हर पल हो खुशहाली.
लहराता रहे ध्वज हमारा, सारा जहाँ स्वतंत्र हो,
बचपन से बुढ़ापा, सारा जीवन वसंत हो.

मन मंदिर में दर्शन दो माँ,
शुभ कर्म पुष्प स्वीकार करो माँ.
करूँ आराधना सदा तुम्हारी,
ऐसी बुद्धि बना दो माँ.

काम क्रोध के जालों से,
मुक्ति मिले हर विपदाओं से.
वरद हस्त जो तेरा माँ.
मेरे सिर पर रख दो.

तूफानी मझधारों में आँचल माँ,
मेरे हाथों में पकड़ा दो.
विवेकानंद सदृश्य बना दो माँ,
काले मन  को  स्वेत कमल बना दो माँ. 

मानवता की सेवा में लग जाये आयु सारी,
सबके ह्रदय में स्नेह बरसा दो माँ.
करूँ आराधना सदा तुम्हारी,
ऐसी बुद्धि बना दो माँ.

वाणी ऐसी मैं बोलूँ,
सबके जीवन में रस घोलूं.
हर संगीत में प्रेरणा तेरी,
सम्पूर्ण सृष्टि रचना तेरी.

मन मस्तिष्क में केवल तुम हो
ज्ञान –विज्ञान की कल्पना तुम हो
हर कला हर कल्पना है तुम्हारी,
मुझमें भी एक अंश डाल दो माँ.

आस्था और श्रद्धा, ना कम हो कभी,
ऐसी बुद्धि बना दो माँ.
करूँ आराधना सदा तुम्हारी,
ऐसी बुद्धि बना दो माँ.

-  अभिषेक कुमार 

बुधवार, 16 अगस्त 2017



प्रभात फेरी

भारत माता की - जय ! वन्दे मातरम् ! महात्मा गाँधी - अमर रहे ! सुभाष चन्द्र बोस - अमर रहे ! भगत सिंह - अमर रहे ! भारत माता की - जय ! भारत माता की - जय !.....
उस वक्त मैं प्रथम कक्षा का छात्र होऊंगा. ये वाकया मुझे आज भी खूब अच्छी तरह से याद है. जिसे आज मैं आपसे शेयर कर रहा हूँ.
बच्चों के बुलन्द आवाज सुनते ही मैं जगा. शायद प्रभात फेरी जा रही है. मैं झट से अपने बिस्तर से उठ कर घर के मुख्य दरवाजे की तरफ भागा. मैंने देखा मेरे साथी जोर-जोर से नारा लगा रहे थे. “आज क्या है.......15 अगस्त.” “आज क्या है...स्वतंत्रता दिवस.”  हाथों में तिरंगा झंडा लिए सारे बच्चे आगे बढ़ते चले जा रहे थे. काश मैं और पहले जग गया होता तो मैं भी इस प्रभात फेरी में शरीक हो गया होता. पर क्या करूँ. मन तो कर रहा था दौड़ कर उस पंक्तियों में जा मिलूं. पर नहीं, मैं तैयार भी तो नहीं. मैं इन कपड़ों में कैसे जा सकता हूँ. कई बच्चे मुझे देख कर तो हँस भी रहे थे कि मैं अभी-अभी सोकर उठा हूँ.  
भीड़ जा चुकी थी. मैं निराश होकर वहीँ दरवाजे पर बैठा उन आवाजों को सुनकर ये कल्पना करने लगा कि मोड़ तक सब पहुँच चुके होंगे. अब तो वे सब पाठशाला भी पहुँच चुके होगें. मैंने मन ही मन माँ से कहा –“तुमने मुझे क्यों नहीं उठाया, तुम जानती हो आज प्रभात फेरी थी.”
तभी पीछे से माँ की आवाज आई..... “शेखर.....”, “शेखर.....”
“उठो बेटा...., स्कूल नहीं जाओगे.”
मैंने कहा “अब क्या करूँगा स्कूल जा कर....”
तभी अचानक मुझे होश आया...
“क्या कहा ? स्कूल जा कर क्या करेगा ? मालूम नहीं तुझे आज क्या है...”माँ ने कड़क स्वर में कहा.
मैं समझ चुका था कि क्या माजरा है. मैं नींद में था. मैं तो अब तक सपना देख रहा था और अचेतन अवस्था में बोल रहा था. ये विचार मन में आते ही मैं आँगन की तरफ भागा.
क्यों कि बीते शाम को मैंने तिरंगा झंडा बना कर सूखने के लिए रखा था.पर यह क्या झंडा गायब. झंडा ना पाकर मन में दुःख हुआ. मैंने परेशान होगा पूछा- “माँ! झंडा कहाँ है?”
माँ ने कहा- “मुझे क्या पता, जल्दी नहा लो. देर हो रही है.”
मैंने फिर सवाल दुहराया.
तो  माँ ने पूछा - “कहा रखा था तुमने?”
“यही तो आँगन में” मैंने हाथ से इशारा करते हुए कहा.
“तो यही कहीं होगा या फिर रात को ओश से गल गया होगा. कागज का था ना.”
“तो लकड़ी तो होनी चाहिए ना.” मैंने कहा.  रुआंसे स्वर में कहते ही मेरे आँखों में आँसू आ गए.
माँ ने कहा –“तो रो क्यों रहा है फिर बना लेना. इसमें रोने की क्या जरुरत”
अब समय कहाँ है. मन ही मन कहते हुए बाथरूम की तरफ बढ़ा.
मन बड़ा परेशान था. कई तरह आशंकाएँ उठ रही थीं. आखिर हुआ तो क्या हुआ. कोई ले तो नहीं गया. नहीं रात को सोने के पहले तक तो मैं देख कर गया था. सही सलामत था. आज की भांति उस समय, तिरंगे प्लास्टिक के मैंने देखे भी न थे. बस कपडा वाला ही होता है यही जनता था. और होता भी होगा तो गांव में कहा. मैंने कितने जतन से बनाया था वो तिरंगा झंडा. पहले तो कागज को एक दुसरे से चिपका कर बड़ा किया. फिर गेंदा फूल को इक्कठा कर केशरिया रंगा. फिर उसकी पत्ती से हरा रंग रंगा. डेर सुई की मदद से चक्र बनाया. एक मोटी सी छड़ी खोज कर उस से चिपकाया. इतनी मेहनत के बाद क्या मिला. झंडा गायब.  
मैं नहा कर तैयार हुआ. माँ शायद रसोईघर में चाय बना रही थी.
तभी पास का ही एक साथी ऋषि मेरे घर आया. बोला –“जल्दी चलो देर हो जाएगी.”
“मुझे नहीं जाना” मैंने कहा
उसने पूछा “क्यों ”
मैंने कहा “बस कुछ नहीं कल जो मैंने झंडा बनाया वो मिल नहीं रहा.”
वो बोला- “ तो क्या हुआ, बहुत सारे लड़के के पास झंडा नहीं होगा.”
 वो मुझे हाथ पकड़ कर खीचने लगा.
पर मेरे मानो मेरे पैर जमीं से चिपक गए हों.
मेरे कदम उठ ही नहीं रहे थे. झंडे ना मिलने की वजह से मैं विद्यालय जाना नहीं चाह रहा था.
उसने कहा “क्या हुआ अब तेरे को, अरे वहां जायेगा तो कम से कम दो जिलेबियां तो मिलेगी?
मैंने कहा- “तुझे खाने की पड़ी है.”
इतने में माँ आवाज देती है.
“लकड़ी वहां रखी है. लेते आओ.”
मैं जैसे ही कमरे के पीछे  लकड़ी लेने गया एक कोने में तिरंगा झंडा पड़ा मिला. मैंने झट से चिल्लाया - माँ देखो .झंडा यहाँ है.
“क्या कहा” माँ ने कहा.
“झंडा मिल गया.” मैंने कहा
“इधर आ लकड़ी ले के पहले” माँ ने कहा.
मैं रसोई घर में लकड़ी रखा. और तिरंगा झंडा लिए दौड़ पड़ा.
मेरे अन्दर ऐसी विद्युत सी उर्जा का संचार हुआ. पैर को जैसे पंख लग गए हों. मन उत्साह से भर उठा. उस वक्त जो मनःस्थिति स्थिति थी मेरी वो अब कहाँ. कितना पावन. कितना निच्छल. देश प्रेम से ओतप्रोत. आज जब मैं खुद को तुलना करता हूँ तो अभी की देश भक्ति की जो भावना है उसमें न जाने कितने तरह के बिष घुल गए है.
 जाति- धर्म, भाषा- प्रांतीयता और ना जाने कितने दोष. हमारी सोच आज कितनी स्वार्थपूर्ण हो गई है. दिन- रात हम सर और सिर्फ अपने बारे में, अपनी सुख सुबिधा जुटाने में लगे हुए है. और जो भी अपना रोजगार या नौकरी कर रहे है जिससे देश को विकास के पथ पर आगे ना बढ़ा कर उसके राहों में रोड़े पैदा करते हैं. आये दिन तथाकथित बड़े बड़े घोटाले सामने आ रहे हैं. सृजन घोटाला प्रत्यक्ष प्रमाण है. हमें जितना ज्यादा खतरा सीमा क्षेत्र में उससे कहीं ज्यादा अन्दर के दुश्मनों से है.
कुछ ऐसे ही भाव हमारे गणमान्य अतिथि और शिक्षक गन से सुनने को मिले पर उस वक्त तो ये ध्यान और ज्ञान कहाँ होता है कि देश के अन्दर-बहार क्या होता है. अगर होता भी है तो उससे ज्यादा इंटरेस्ट तो उन मीठे जिलेबियों में होता है. कतार में लगे धूप में पक रहे छोटे बच्चे को यही लगता है कि कब बकवास समाप्त हो और जिलेबी हाथ में आये. आखिर पूरा गांव की परिक्रमा कर चूके थे सब. और गले भी तो सुख रहे थे.
दो ढाई घंटे बाद कार्यक्रम समाप्त हुआ. जिलेबियाँ बंटनी शुरू हुआ. मेरी बारी अभी आनी बांकी थी. मैं प्रतिदिन पाठशाला आने वाला छात्र था. आज वो बच्चे कतार में खड़े थे जिन्हें मैंने पहले कभी नहीं देखा थे.कुछ के नाक बह रहे थे, तो कोई पता नहीं कितने दिन से नहाया ना हो. कुछ के पेंट जमीं में लोटते जा रहे थे तो किसी का पेंट छाती को छू रहा है. कोई अपने छोटे भाई को ले खड़ा है तो कोई बड़ी बहन अपने छोटे भाई को गोद में. छोटी छोटी हथेलियाँ जिनमें एक जिलेबी मिल जाए तो ऐसा लगता जैसे उन्हें मेहनत का फल मिल गया. और जिन लड़कों ने हालाँकि ये पहली दूसरी कक्षा में पढ़ते हों पर गाली देने में पीएचडी कर रखी हो. आखिर वो लड़ भीड़ कर अपने हाथ में जिलेबी पा ही लिए. जो स्मार्ट टाइप के बन्दे होते वो पहले ही कह देते हे हों “हमरा सौसा जिलेबी दिहो ने तअ हम्म नाय लेभों” जो अच्छे घराने के होते. सर उसे दो पिस देने की सिफारिश कर देते. कहते “मम्मी को दे देना. मेरी तरफ से.” किसी अन्य को भी रोकते हुए कान में कुछ कहते . नहीं मालूम क्या उन्होंने कहा. पर कुछ ऐसा जरुर कहा जिससे वो लड़की सरमा रही थी. अंत में उस लड़की के वह से हटते-हटते कह देते – “माय क कहिय, आय हम्मअ पहुची रहलो छियों.”
रात हुई. मैं दिन भर किये हुए काम और बातचीत को पुनरवलोकन कर रहा था. इतने में माँ आई.
पूछी “खाना नहीं खायेगा का जो छत पर पसरा हुआ है.”
मैंने कहा- “क्या बनाई हो?”
वो कहीं –“क्या बताउगी, तभी खायेगा”
मैं कड़क स्वर सुन कर पलक झपकते ही उठ खड़ा हुआ और माँ के पास जा बैठा. अभी - अभी मेरे आँखों में तारे झिलमिला रहे थे और अब रोज रोज एक ही तरह की सब्जी देखकर आखें गड़ने लगी.
बचपन में मुझे सब्जियों से सख्त नफरत थी. खास कर पटल और कद्दू से. खैर मैं ने खाना शुरू किया. और अच्छा माँ बताओ “तुमने ही झंडा रखा था ना, मुझे बताया क्यों नहीं. मैं बेवजह परेशान हो रहा था.”
माँ- “तुझे तो अपनी पड़ी है, ये देखता है कि एक सुबह से मैं कितना खटती हूँ.”
मैं चुप माँ की तरफ कृत्यज्ञता से निहारता रहा. वो फिर कहीं “अपना और अपने सामान का ख्याल रखना कब सीखोगे.”
मैं उस वक्त नहीं समझता था उस फिक्र को. माँ के उस डाट फटकार को. पर वही तो असली प्यार था. जिसका आज मैं मोहताज हूँ.
मैं पुनः अपना बिस्तर ठीक कर लेट गया. खुले आसमान को निहारना सचमुच आजदी का एहसास दिलाता है. साथ ही साथ हम अपनी नगण्यता और अज्ञानता का भी बोध होता है. मैं इस स्वप्न में खो गया कि एक दिन मैं भी अपने पिता की तरह दुश्मनों से लड़ते हुए सीमा पर शहीद हो जाऊँगा. और इन सितारों की भांति मैं भी आसमान में चमकूँगा. आज मैंने प्रभात फेरी में हिस्सा लिया और इश्वर करे एक दिन मैं भी राष्ट्रीय परेड का हिस्सा बनूँ. जिनके 
क़दमों से धरती हिल जाए...

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C-7a: Pedagogy of social science [ B.Ed First Year ]

1. माध्यमिक स्तर पर पढ़ाने के लिए आपके द्वारा चुने गए विषय का क्षेत्र क्या है ? उदाहरण सहित व्याख्या करें। माध्यमिक स्तर पर पढ़ाने के लिए हम...