शुक्रवार, 6 जुलाई 2018

मास्टर जी का कुर्ता


मास्टर जी का कुर्ता
कपड़ा केवल हमारे शरीर को ढकने की चीज ही नहीं है, बल्कि हमारे व्यक्तित्व को निखारने में हमारे कपड़े का महत्वपूर्ण स्थान है। किसी व्यक्ति का पोशाक उसकी पहचान होती है। हर प्रांत या समुदाय के लोग अपनी सभ्यता और संस्कृति के अनुसार वस्त्र धारण करना पसंद करते हैं । भारतीय समाज में भी कुर्ता एक जाना पहचाना और लोकप्रिय पहनावा है।
हमारा देश धर्मनिरपेक्ष है। यहाँ विभिन्न धर्म के लोग निवास करते हैं। इन्हीं कारणों से हमारे देश की एक अलग पहचान पूरे विश्व मे स्थापित है। कमाल की बात ये है कि सभी धर्मों के लोग कुर्ता पहनना बड़े गर्व कि बात समझते हैं। कश्मीर से कन्याकुमारी तथा असम से गुजरात तक सारे भारतवासी कुर्ता पहनने के दीवाने और शौकीन है। हो सकता है कि कोई कुर्ता के साथ बंडी या पजामा पहना पसंद करे तो कोई कुर्ता के साथ धोती और सिर पर टोपी। सीख - पंजाबी, मुस्लिम हो या हिन्दू सभी कुर्ते को अलग-अलग रंग-ढंग से पहना पसंद करते हैं । कोई रेशम का कोई खड़ी का, कोई और किसी किस्म का पहनना चाहते हैं तो किसी को रंग-बिरंगा कुर्ता अच्छा लगता है। कई लोग तो मोटे या महीन चेक (चकोर धारीदार) पहनकर इतराते हैं। ये तो रही सामाजिक बातें, अगर हम राजनीतिक क्षेत्र कि तरफ चलें तो वहाँ हमें सिर्फ सफ़ेद कुर्ते धारण किए हुए नेता मिलेंगे।
आधुनिक युग कुछ बदलाव हुए हैं परंतु कुर्ता का महत्व कम नहीं हुआ है। महात्मा गाँधी के युग में तो भारतीय की  पहचान और क्रांतिकारियों की पोशाक कुर्ता ही था। कुर्ता पहन कर जब हमारे देश के वीर क्रांतिकारी वंदे मातरम का उद् घोष करते थे तो अंग्रेजों के मन में डर समा जाता था।  वे सोचते थे कि ये कुर्ताधारी क्रांतिकारी हमारे कंपनी को कुचल डालेंगे। हाथों में तिरंगा लिए वीर बलिदानी और सिने पर गोलियां खाई और अंतिम साँसों तक वे लड़ते रहें। उनके कुर्ते खून से रंग गए फिर भी उन्होने हार नहीं मानी। अंत में क्रांतिकारियों की जीत हुई और हमारा देश आजाद हुआ।

तमाम मुसीबतों के बावजूद हमारा देश लगातार प्रगतिशील है । हमारा देश हर क्षेत्र में तरक्की कर रहा परंतु हम भारतीय को चोट तब पहुँचती जब हमारे चुने हुए नेता भ्रष्टाचार में लिप्त पाये जाते हैं । सफ़ेद कुर्ते में छिप कर देश के साथ गद्दारी कर उन शहीदों का केवल अपमान ही नहीं करते बल्कि हम भारतीय युवाओं का भविष्य की अनदेखी करते हैं।

कुदरत कि सर्वश्रेष्ठ  कलाकृति मनुष्य है और अगर मनुष्य कि तमाम कारीगरी या आविष्कारों कि गिनती करें तो हमारे पोशाक भी उनमें अभिन्न स्थान रखते हैं। ग्लोबलायजेशन के इस दौर में हमारे कपड़ों में भी परिवर्तन आया है किन्तु भारतीय लोगों में कुर्ते के पहनावे के प्रति अब भी उतनी ही इज्जत है जितना पहले हुआ करती थी। कोई धार्मिक कर्मकाण्ड हो, जैसे विवाह, यज्ञ एवं अन्य अनुष्ठान या कोई पर्व त्योहार जैसे होली दिवाली इत्यादि। यहाँ तक कि स्वतन्त्रता दिवस और गणतन्त्र दिवस के उपलक्ष्य पर लोग कुर्ता पहनने पर अधिक ज़ोर देते है क्योंकि कुर्ता पहनकर व्यक्ति खुद को अधिक सुसंस्कृत और सभ्य महसूस करता है। लोगों कि दृष्टि में कुर्ता पहनने वाला व्यक्ति सदाचारी समझा जाता है। हमारे देश में लगभग सभी महापुरुषों, महात्माओं, समाजसेवकों, स्वतन्त्रता सेनानियों, सभी कि मुख्य पोशाक कुर्ता ही तो था। उन्होने हमारे समाज में जो आदर्श स्थापित किए वही आदर्श हमारे बोली विचार रहन सहन, पहनावा – ओढ़ावा में परिलक्षित होता है । सदा जीवन – उच्छ विचार का प्रतिनिधित्व तो भारतीय वस्त्रों में कुर्ता ही सर्वप्रथम हमारे सामने उपस्थित होता है। इसी कुर्ता से जुड़ा एक रोचक किस्सा सुनता हूँ ।


मास्टर जी आज बहुत खुश हैं। इस खुशी से उनकी बोली में अत्यधिक मधुरता का समावेश हो गया। वे अपने प्रत्येक कार्य बड़ी दिलचस्पी से कर रहे हैं। यूं तो वे सारा कार्य नियत समय पर करते और उनकी खास बात यह है कि हर कार्य करने का उनका अपना तरीका है। वे सदा खुश रहने वाले व्यक्ति है परन्तु आज कुछ ज्यादा खुशी उनके चहरे से छलकती नजर आ रही है। इस खुशी का डबल कारण है एक नया कुर्ता सिलवाना है , दूसरा 15 अगस्त आने वाला है। जाने–अनजाने हर व्यक्ति के साथ ऐसा हो ही जाता है कि जब वह नया वस्त्र धारण करे और उसके चेहरे पर खुशी आ ही जाती है। वे खुद समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर मुझे आज का दिन ज्यादा अच्छा क्यों लग रहा है फिर भी वे अंदर ही अंदर एक सुकून- संतुष्टि का अनुभव कर रहे थे। मास्टर जी को दो चीजों से उन्हें बड़ा प्रेम है । पहला किताब और दूसरा कुर्ता। उन्हें किताबें पढ़ने और सहेज कर रखने का बड़ा शौक है, वहीं कुर्ता पहनने के बचपन से ही शौकीन है। कोई किताब हो उसपर जिल्द लगाना नहीं भूलते ठीक वैसे ही इस्तरी किया हुआ कुर्ता ही अक्सर पहना करते। मास्टर जी का कुर्ता इस्तरी किया हुआ ना हो ऐसा नहीं हो सकता। अगर उन्हें कहीं जाना हो तो और किसी कुर्ते में इस्तरी नहीं किया हुआ हो तो वे खुद इस्तरी करने लग जाते । उन्होने कई तरह के इस्तरी खरीद लिए है। जैसे-जैसे समय गुजरता गया वैसे वैसे इस्तरी भी बदलते गए।
पहले कोयला वाला, फिर लकड़ी वाला, फिर एलेक्ट्रिक वाला। वे कुर्ता को अक्सर कमीज कह कर संबोधित किया करते हैं। उनके कमीज में कॉलर नहीं होता है और आज कल तो कई तरह के मीज मे कुर्ते कि नकल किया जाने लगा है। उनका मानना है कि कॉलर तो गले का फंदा है । कॉलर आदमियों के नहीं जानवरों के गले में होना चाहिए। कॉलर लगाने कि प्रथा तो अंग्रेजों कि है जिसका उपयोग गले में टाई बांधने के लिए करते है।
कुछ दिन बाद 15 अगस्त यानि स्वतन्त्रता दिवस है। मास्टर जी के पास कई कुर्ते हैं। परन्तु वे नए कुर्ते में झंडोत्तोलन करना चाहते हैं। स्वतन्त्रता दिवस के दो सप्ताह पूर्व ही योजना बनाकर तैयारियों में जुट जाते हैं। मास्टर जी ने अपने गाँव के एक कुशल दर्जी श्याम को कुर्ता सिने को दे दिये ।
कुछ दिनों बाद- मास्टर जी दर्जी के पास गए। वे श्याम से पुछे “क्या मेरा कुर्ता तैयार हो गया है?”
 “आपका कुर्ता तो मैंने दे दिया” उसने जबाब दिया।
मास्टर जी ने चौकते हुए पूछा – क्या?
“ कुर्ता आपको मिल चुका है” दर्जी एक बार एक बार अपनी नजर उठाकर कर कह दिया। फिर मशीन चलाने में मशगूल हो गया। 
“तुमने कब और किसे मेरे कुर्ते दिये ” मास्टर जी ने घबरा कर पूछा  ।
श्याम ने अपने यहाँ काम करने वाले दिनू को पुछकर कहा- “वही दो – तीन दिन हो रहे हैं”

इसी वक्त आप यहाँ आए थे और अपना कुर्ता ले गए। मास्टर जी बड़े असमंजस मे पड़ गए। उनकी याददस्थ में कुछ कमी थी ये जग-जाहीर था। वे सोचने लगे .... मैं यहाँ  से कब कुर्ता ले गया । मुझे तो अपने कामों से आज फुर्सत मिली है। फिर उन्होने सोचा चलो पहले घर में पूछ लेता हूँ। घर आकर सभी सदस्यों से पुछने पर कोई पता नहीं चला। उनकी समझ में बिलकुल नहीं आ रहा था। कि कुर्ता गया तो आखिर गया कहाँ? उन्होने कुर्ते के मूल्य से ज्यादा 15 अगस्त को नए कुर्ते के मूल्य से ज्यादा 15 अगस्त को नए कुर्ते न पहले जाने कि चिंता थी। सारी तैयारियां पूरी हो चुकी थी। सारे चीजों का बंदोबस्त हो चुका था। केवल कुर्ता ही समय पर नहीं मिल पाया था। फिर उन्होने अपने पिछले दिनो आए गए रिस्तेदारों से फोन पर पूछा कि मेरा कुर्ता तो तुम लोगों के साथ तो नहीं चला गया है? पर वहाँ से भी निराशा हाथ लगी। रिस्तेदारों को भी बड़ा अजीब लगा उन्होने कहा- नहीं, यहाँ कोई कुर्ता नहीं आया है ।
मास्टर जी अब थोड़े चिंतित हो गए। शाम को अपने घर से घूमने बाहर निकले। रास्ते में उनकी मुलाक़ात उनके मित्र से हुई। उन्होने उदासी का कारण पूछा तो मास्टर जी अपने कुर्ते ना मिलने कि व्यथा सुनाई। व्यथा की बातें पूरी होते ही मास्टर जी के मित्र ने बोलना प्रारंभ किया। “श्याम दर्जी के बारे में मत कहिए । सारा इलाका उसके व्यवहार से परिचित है। उसने कई व्यक्तियों के साथ इसी तरह का धोखा धड़ी किया है । उसने तो एक बार मेरी कमीज नाप से छोटी सील दिया था। दूसरे बार जब मैं उसके यहाँ सिलवाने गया फिर मैंने कान पकड़ लिया साथ ही खुद से वादा किया की अब कभी भी नहीं जाना सिलवाने उसके यहाँ । दूसरी बार में तो उसने हद ही पर कर दी। उसने मेरे फूल हत्थे की जगह हाफ हत्था वाला कुर्ता सील दिया था”। इतने में तीसरा मित्र ने भी कई और त्रुटियाँ गिना दी ।
रात हुई मास्टर जी फिर सोचने लगे। मेरा कुर्ता दिनु ने ही गायब किया होगा। वह झूठ बोल रहा है। उसे तो मजा चखाना ही पड़ेगा वरना ऐसे नहीं सुधरेगा।
दिन निकला वे अपना कम निपटा का श्याम दर्जी के पास चल दिये । मास्टर जी ने दिनु के पास पहुँच कर अपने कुर्ते देने की बात दुहराई। श्याम ऐसे कह रहा था मानो वह कुर्ते के बारे में कुछ जनता ही नहीं । मास्टर जी ने बातें खीच कर अपने घर की तरफ चल निकले। मास्टर जी को लागने लगा कि अब वह कुर्ता मिलने वाला नहीं है सो पुराने कुर्ते से ही कम चलाना पड़ेगा। अब मास्टर जी कुर्ते के प्रति चिंता नहीं थी क्योंकि उन्हें जो कहना था कह दिया था और जो करना था वे कर चुके थे।
अपने पुराने कुर्ते को अच्छी तरह धो कर सूखने दिया। फिर शाम को उन्होने उस कुर्ते में इस्तरी कर दी। कल पहन कर जाना है।
सवेरा होते ही प्रभात फेरी का जयघोष सुनयी देने लगा। मास्टर जी तो पहले से तैयार थे। बच्चों के हाथों में तिरंगा देखकर और जुबां पर भारत माता की जय सुनकर काफी अच्छा लग रहा था। बच्चों की लम्बी कतार जो आगे चलती चली जा रही है, देखना बड़ा गौरवान्वित सा लग रहा था। झंडोतोल्लन के लिए पंचायत सभा की ओर से आमंत्रित किया था। वे समय पर पहुँच कर झंडोत्तोंलन किए। सभी लोग उनके भाषण और उनके कुर्ते की तारीफ कर रहे थे। फिर अंत में उनके एक मित्र ने पूछा “श्याम ने आपका कुर्ता कैसे दिया?”आखिर आपने उससे क्या कहा?
मास्टर जी ने मुसकुराते हुए कहा मैंने केवल इतना कहा कि “मैं कल अपने नए कुर्ते पहन कर भाषण देता लेकिन जब कुर्ता नहीं मिलेगा तो फिर उस भाषण में तुम्हारा नाम और काम सभी के सामने लाऊँगा। सभा में तुम्हारी बेईमानी और काली करतूत सभी के सामने आ जाएगी। इससे तुम्हारे पास कोई नहीं आएगा। तुम्हारी दुकान बंद हो जाएगी।”
शायद इसी डर से उसने तड़के ही कुर्ता पहुंचा दिया और मुझसे माफी मानते हुआ कहा “मैं अपनी गलती पर शर्मिंदा हूँ , आगे ऐसी गलती नहीं करूंगा ”
फिर उसे मैंने समझाया गलत तरीके से कमाया हुआ धन बिल्कुल नहीं फलता फूलता है, इसलिए आज तक तुम गरीब के गरीब हो । ईमानदारी से ही हमारी तरक्की होती है ।
इसी सीख को लेकर श्याम को आज एक साल से भी अधिक हो गए। उसने मास्टर जी को एक कुर्ता भेंट स्वरूप दिया क्योंकि आज उसके दुकान से उसकी कई गुणी अधिक तरक्की हो रही है। मास्टर जी इस घटना को सुनाते नहीं थकते।

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अखण्ड ज्योति


अखण्ड ज्योति
नव युग की संदेश वाहिका,
नवप्रभात की सुन्दर कलिका ।
महाकाल की नवीन चेतना,
साधु संत की प्रेरक संवेदना ।
ऋषि महर्षि की प्रखर साधना,
मानवीयता की अग्रदूत बनकर ।
विचार क्रांति का मशाल लिए,
अखण्ड ज्योति अवतीर्ण हुई है।


संस्कृति की बोध पुस्तिका,
संस्कार के बीज रोपने।
अध्यात्म ज्ञान से सिंचित करने,
विज्ञान क्षेत्र का विस्तार करने,
विचार शीलता को पोषित करने।
साहित्य जगत का उद्धार करने,
युग निर्माण का शंखनाद कर।
जन जन को श्रेष्ठ पाठ पर चलाने,
अखण्ड ज्योति अवतीर्ण हुई है।


नास्तिकता का निशान नहीं,
कुरीतियों की कालिख नहीं।
विपत्तियों मेन अब कोई अकेला नहीं,
राहे जिंदिगी में अब कोई भटेगा नहीं ।
गायत्री मंत्र है अमृत अनुदान,
गुरुवचन है पारस की खान ।
पूज्य गुरुदेव ने अपना जीवन हवन कर,
उज्ज्वल भविष्य की शुरूआत हुई है।  
ईश्वरीय कृपा का अभिसिंचन करने,
अखण्ड ज्योति अवतीर्ण हुई है।

मुर्क्षित मानवता में नव जीवन आई है,
अज्ञान – अंधरे से सबसे मुक्ति पाई है ।
संशय – संदेह नहीं रहे, अब खुशहाली है,
काम क्रोध लोभ की जंजीरों को तोड़ें हम ।
युग ऋषि के बतलाए मार्ग को अपनाएं हम,
यज्ञ सुलभ लेकर आए गुरुवर ।
जन – जन को प्रज्ञावान बनाने,
अखण्ड ज्योति अवतीर्ण हुई है ।

जहाँ चर्चा हो गुरुवर के पाती की,
चेतन बन जाए जड़ भी माटी  भी ।
परिवारों में प्यार बढ़े,
बच्चे सदाचारी बने।
युवाओं का आत्मविश्वाश बढ़े,
अभिभावक उत्तरदायी बने।
प्रज्ञावतार पूज्य गुरुदेव सृजित किए ,
वैज्ञानिक – अध्यात्म की आधार-शीला,
मनुष्य में देवत्व जगाकर,
स्वर्गधरा पर लाने;
अखण्ड ज्योति अवतीर्ण हुई ।

वेदमूर्ति की दिव्य कक्षा,
तपोनिष्ठ की दिव्यसुरक्षा ।
श्री राम की पुरुषार्थ परीक्षा,
पूज्य गुरुदेव की संकलित दीक्षा ।
ये पत्रिका नहीं पारस है,
सबको स्वर्ण बनाने;
अखण्ड ज्योति अवतरण हुई है ।

गुरु - शिष्य  का गौरव नाता,
पिता- पुत्र का पवन रिस्ता।
पूरा विश्व अंधेरे में,
पूज्य गुरुदेव ने, अदभूत ज्योति जलाई।
पूरे विश्व को परिवार बनाकर,
हाथ – पकड़कर चलना सिखाये।
गृहस्थ जीवन को तपोवन बनाकर,
वात्सल्य प्रेम की गंगा बहाने;
अखण्ड ज्योति अवतीर्ण हुई है ॥  

-  -  अभिषेक कुमार
abhinandan246@gmail.com




सोमवार, 2 अप्रैल 2018

.......चम्पा को बचाना है.......

हम सब ने ये ठाना है।
चम्पा को बचाना है ॥ 
निर्मल हो इसकी धारा,
अब कोई कूड़ा - कचरा, 
इसमें ना  गिरना है ।
हम सब ने ये ठाना है।
चम्पा को बचाना है॥


भागलपुर की धरती हो हरी भरी,
आओ एक- एक मिलकर पेड़ लगायें ।
8 अप्रैल के मैराथन में,
आओ सारे मिलजुलकर दौड़ लगायें ।
पीपल के इस मिशन को,
सफल बनाना है।
माता समान, यह  चम्पा नदी
इसको स्वच्छ बनाना है। 
हम सब ने ये ठाना है।
चम्पा को बचाना है॥ 


मृत्यु सैय्या पर पड़ी,
जो भागीरथी थी कभी।
जीवन दायनी ये गंगा, 
नाला कहलाने को मजबूर है ये अभी।
इस पुण्य तीर्थ के थी समान ,
हुआ इसका अघोर अन्याय- अपमान । 
हम नगर वासी, अगर अब भी ना जागे ।
तो बड़ी कीमत चुकानी होगी ।
जो अगर, भाग ना लिए तुम,
इस अभियान में,
तो निश्चित ही तुमको पछताना है।


हम सब ने ये ठाना है।
चम्पा को बचाना है॥ 


यह चुनौतियों की विषम वेला है,
ना जाने किसने, घृणा का विष घोला है।
आओ भाई ! आओ बहना ! 
भागलपुर, यह  आदर्श नगर 
(जिसे आप सब स्मार्ट सिटी कहते हैं ) 
इसकी विरासत को, ना अब हमें खोना है,
भाईचारे के रंग में हमसबको रंग जाना है।
हम सब ने ये ठाना है,
चम्पा को बचाना है ।। 


-अभिषेक कुमार 










बुधवार, 14 मार्च 2018


दौड़िए
क्योंकि यही एक विकल्प है।


“ दौड़ता हुआ घोड़ा और चलता हुआ आदमी कभी बूढ़ा नहीं होता ’’ आपने कई बार सुना होगा । आइए इसे थोड़ा और सही तरीके से कहते हैं। “ घोड़े की तरह दौड़ता हुआ आदमी कभी बूढ़ा नहीं होता। ”

दौड़ना ही जीवन है। दौड़ना यानि गतिमान रहना। गति है , मोशन है तभी तक जीवन है। ठहर गए तो मृत्यु है। जब तक हमारे तन में खून दौड़ रहा है सांसें आ-जा रहीं हैं। तभी तक आप जिंदा हैं। इसलिए जिंदा रहना है तो दौड़िए। स्वस्थ रहना है तो दौड़िए। अमीर बनना है तो दौड़िए। स्वास्थ्य और समय, दोनों हमारे लिए धन के समान है,या कहें धन से कहीं ज्यादा मूल्यवान है। एक व्यक्ति जो दौड़ता है तो समझिए वह पैसे कमा रहा है क्योंकि उसके पैसे, जो दवा पर खर्च हो रहे थे; वह पैसा अब बच रहा है। दौड़ने से, हमारी कार्यक्षमता और सोचने की क्षमता का अद्भुत विकास होता है। चाहे कोई भी क्षेत्र हो, हम जीवन में तभी सफल हो सकते हैं; जब हम शारीरिक और मानसिक रूप से फिट हों।  हम जीवन का वास्तविक आनंद तभी ले सकते हैं जब तक कि हमारा तन और मन दोनों स्वस्थ हों।

आधुनिक कार्य शैली और डेली रूटीन ने हमें बुरी तरह से प्रभावित किया । दूषित वातावरण और मिलावटी / प्लास्टिक युक्त भोज्य पदार्थ का सेवन करने से प्रतिदिन हम इनके दुष्परिणाम से जूझते जा रहे हैं। सारा दिन हम बैठे हुए बिता देते हैं। ऐसे हालात में हर दूसरा व्यक्ति मोटापे का शिकार होता जा रहा है। मोटापा सभी रोगों कि जड़ है। मोटापा से ही सभी खतरनाक बीमारियों को आमंत्रण मिलता है जैसे डाईबीटीज़, ब्लड–प्रेशर, हार्ट अटेक, ब्रेन हमरेज, मिर्गी, हड्डी व जोड़ों में दर्द आदि।

कहा जाता है हमारा शरीर मंदिर के समान है किन्तु अब हमारा शरीर बीमारियों का घर के समान हो गया है। ऐसे घर को खंडहर में तब्दील होने में देर नहीं लगते हैं। अतः सतर्क हो जायें। बस ऐसा समझिए कि आपने दौड़ना शुरू नहीं किया तो मौत, आप का शिकार कर लेगी। या फिर शोले फिल्म का वो सीन याद करें।  जिसमें गब्बर के हाथों की बन्दूक चल जाती है जैसे ही बसंती के कदम रुकते है। बीमारियाँ भी इसी ताक में रहती हैं कि हम गलती करें और उन्हें अटैक करने का मौका मिले। अगर आप इन बातों को नहीं समझ रहे तो फिर बस इतना जान लिजिए कि आप बीमारियों के चंगुल से कभी नहीं निकल पाएंगे। अगर आपने दौड़ना शुरू नहीं किया तो यदा कदा हीनता और मज़ाक का सामना करना पड़ सकता है। अगर आपने दौड़ना शुरू नहीं किया तो आपके सपने, आपके लक्ष्य कभी पूरे नहीं होंगे। कामयाबी तभी आपके पास आती जब आप में आकर्षण हों। आज का युग तीव्र प्रतियोगिता का युग है। जहां रफ्तार ही मायने रखता है। कामयाबी चाहिए तो दौड़िए। कहीं आप पीछे ना रह जायें, इसलिए दौड़िए। स्वयं से प्यार करते हैं तो दौड़िए। स्वयं का जानना है तो दौड़िए । स्वयं को जानना चाहते हैं तो दौड़िए। स्वयं को जीताना चाहते हैं तो दौड़िए।
दौड़ना एक मंत्र है जिसकी पुनरुक्ति से आप लक्ष्य तक पहुँच सकते हैं। दौड़ना ही जीवन लक्ष्य है। यह संघर्ष को पूर्ण रूप से परिभाषित करने में सक्षम है। दौड़ना ही खेल है। दौड़ना ही संस्कृति है। दौड़ना ही वह उपाय है जिससे हम खुद को, समाज को और विश्व को बचा सकते हैं।

आज नदियाँ, पर्वत, जंगल, वायु सारे संसाधन अपने मूल रूप से परिवर्तित/ विलुप्त/ बर्बाद और बेकार हो रहे हैं। अगर हम सब प्रतिदिन मात्र एक आध घंटे दौड़ें तो सब कुछ बचा सकते हैं। दौड़कर हम पूरी मानवता को महान संदेश दे सकते हैं। हम भाई-चारा और एक स्वस्थ प्रतियोगिता को बढ़ावा दे सकते हैं।  हम स्वयं को ऊपर उठा सकते हैं, चाहे हम किसी भी समस्या से घिरे हों। चाहे हमारी आर्थिक, भौगोलिक और बुनियादी चीजें असमान हों। हम दौड़कर अपने साथियों, माताओं, बहनों एवं  तमाम शहर वासियों को जागरूक कर सकते हैं। बस मौका मिले तो चूकिए मत। नींद खुले तो फिर सोयिए मत। उठिए और दौड़ लगाइए। अपनी साँसों को गुनगुनाने दीजिए – “कुछ करिए कुछ करिए”- (चक दे इंडिया)

जिन्दगी बहुत छोटी है बस थोड़े से मौके हैं। जी जान से दौड़िए। बस दौड़ पड़िए। डर के आगे जीत है और जीत के आगे असली जिन्दगी। जीने का वास्तविक लुत्फ लेना है तो दौड़िए । अगर लिया है सफलता का संकल्प आपने तो सोचिए मत। दौड़िए! क्योंकि यही एक मात्र विकल्प है।


आइए इसकी शुरुआत हम खुद से करें। 8 अप्रैल 2018 को भागलपुर में हो रहे मिनी मैराथन में हिस्सा लेकर खुद को चुनौती दे, खुद को साबित करें।

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C-7a: Pedagogy of social science [ B.Ed First Year ]

1. माध्यमिक स्तर पर पढ़ाने के लिए आपके द्वारा चुने गए विषय का क्षेत्र क्या है ? उदाहरण सहित व्याख्या करें। माध्यमिक स्तर पर पढ़ाने के लिए हम...