शनिवार, 3 सितंबर 2016

आदमी और कुत्ता

दो चार लोगों में कुत्तों के रोगों को लेकर काफी चर्चाएँ हो रही थी. मैंने भी सोचा अपनी तरफ से कुछ कह दूँ. तो बिना सोचे समझे मैंने अपना विचार उन मित्रों के सामने रख दिया. मैंने कहा “आदमी और कुत्तों में काफी समानताए दिखने लगी है.यहाँ समानता से मेरा अभिप्राय भोंकने से है.अगर आप वफादारी की बातें सोच रहें हैं तो मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि कुत्ते और आदमी में वफ़ादारी में समानता की बात करना मुर्खता होगी.” इतनी ही बात मैं कह पाया था की मेरा मोबाइल जोर जोर से बजने लगा.फोन पर बात करने के बाद किसी कारण से मुझे वहां से प्रस्थान करना पड़ा.
मुझे लगा की मुझे उन लोगों के समक्ष कुछ ऐसी बातें करनी चाहिए जो बेमतलब हो. सच पूछिए तो लोगों को फिजूल की बातें में बड़ा आनन्द आता है किन्तु जैसे ही कुछ सामजिक बातें या सूझबूझ भरी बातें किए फिर तो आप की खैर नहीं नहीं. आप बिल्कुल उस मेमने की तरह महसूस करेंगे जो चारों तरफ आवारा कुत्तों से घिरा हो. जब मैं वहां से आ रहा था तो मुझे कुत्तों का झुण्ड दिखाई पड़ा जो सब के सब एक दूसरे पर भौंक रहे है. मैं उस गली से दूसरी गली की तरफ मुड़ गया. क्योंकि मैं कुत्तों से बहुत डरता हूँ.
दूसरे शाम मुझे नुक्कर नाटक व हास्य कार्यक्रम देखने को मिला.वहां काफी मनोरंजन हुआ. एक व्यक्ति कुत्तों की मिमिकरी कर रहा था कुत्तों की विभिन्न प्रकार के आवाज निकाल रहा था. कुत्तों के बहुत सारे हरकतों को जानने और खुल कर हँसने का मौका मिला. उस शाम के बाद मेरी रूचि में परिवर्तन सा हो गया है.मैं कभी भी कुत्ते पालने का शौक़ीन नहीं रहा हूँ.
मैं शहर में नया तो नहीं हूँ. फिर भी ना जाने क्यों, हवा बदली हुई सी लग रही है. हर दूसरा आदमी भूखा,बदहवास सा हांफता हुआ बिलकुल कुत्तों जैसा दिख पड़ता है. कुछ आदमियों में आंशिक कुछ में पूर्ण रूप से कुत्तों के गुण सॉरी अवगुण ट्रांसफर हो गए हैं. उदाहरण स्वरूप- शहर के मुख्य मार्ग के किसी भी गली के मुख्य मोड़ पर, आप को एक पोल (खम्भा) दिख जायेगा. पहले उस पोल पर कुत्तों का राज था वे वहीँ बड़े इत्मिनान से, अपनी एक टांग को 45 डिग्री पर उठाते हुए; मूत्र विसर्जन किया करते थे. किन्तु अब वह हर पोल आदमियों का हो कर रह गया है, क्योंकि कभी कोई पोल खाली मिलता ही नहीं. कोई ना कोई वहां अपनी बैचनी शांत कर रहा होता है. पोल के आस –पास का एरिया भी कैप्चर कर लिया गया है. उन लोगों द्वारा जो कुत्तों की अनुवांशिक गुण के शिकार हो गए हैं. बेचारे कुत्ते भी क्या करे वह इन्तजार में खड़ा रहता है कि मेरी बारी है वो सोचता होगा वो भी क्या दिन थे. उस ज़माने में हर कुत्ते का अपना एक पोल रिजर्व हुआ करता था. उस पोल पर सिर्फ एक ही कुत्ते का अधिकार हो सकता है. ऐसे नियम थे तब. अब तो कोई किसी की सुनता तक नहीं.  कि तपाक से दूसरा व्यक्ति आ धमकता है. वो उदास और बेबस हो कर वहां से चल पड़ते हैं. सामने दिवार पर एक फ़िल्मी पोस्टर चिपका था,जिसे निहारते ही  अचानक उसके चहरे पे मुस्कान तैरने लगी.
वो कुत्ता अपनी सामाजिक जिन्दगी से त्रस्त तो था ही पर मेरी समझ में ये बात नहीं आ रही थी. वो इतना खुश क्यों है. उसकी ख़ुशी का मुझे ज्ञान तब हुआ जब मैंने अपने मित्र के पास किसी काम से गया. वे कुत्तों के अनुसन्धान कार्यक्रम से जुड़े थे इसलिए कुत्तों के बारे में भी पूछ ताछ कर लिया. उस अनुसन्धान करने वालों का काम था कुत्तों के बारें में जानकारी इकट्ठा करना. और ये पता लगाना कि आदमी और कुत्तों में क्या समानता और क्या-क्या भेद है.
एक दिन मैं अख़बार पढ़ रहा था. मेरी नज़र एक छोटे से कॉलम के मोटे शीर्षक पर रुक गई. लिखा था- शहर में आवारा कुत्तों की संख्या में बढ़ोतरी. मैं कन्फ्यूज हो गया ये किनकी बात कर रहे हैं. उन जानवर रूपी कुत्तों की या आदमी के रंग रूप वाले.
साहब ! अब वो जमाना चला गया जब लोग विनम्रता के साथ एक दुसरे के साथ पेश आते है. उनमें संवेदनाएं थीं. उनमें एक दुसरे को सहानभूति और प्रोत्साहित करने की प्रकृति थी. अब तो ज्यादातर लोग ऐसे मिलेंगे जैसे किसी पागल कुत्ते ने काट लिया हो. वे बोलते नहीं भोंकते हैं. खबरिया चनेलों पर हो रहे विचार विमर्श या संसद इसके प्रत्यक्ष  उदाहरण हो सकते हैं.
हाँ तो शुरू मैंने कुत्ते पालने की अपनी रूचि के बारे में आपको बता रहा था. एक सुबह मोरनिंग वाक के लिए निकला. ठीक उसी वक्त वो मित्र (कुत्तों के विशेषज्ञ) मिल गए. मैंने उनसे हाल पूछते हुए कहा क्या सब ठीक है ना ?उन्होंने शब्द को रस्सी की तरह खीचतें हुए कहा- ठीई............क है. उनके चेहरे से खीज और झुंझलाहट साफ दिख रहा जिसे वे ढकने का प्रयास कर रहे थे.फिर मैंने अपने काम के बारे में पूछा.वे इतने जोर से मुझपर बिगड़ पड़े. जिससे मेरा सुबह तो ख़राब हुआ ही सारा दिन भी बेकार गया.
ऐसी परिस्थिति से आप का भी कभी ना कभी सामना हुआ होगा. आप सोच में होंगे कि आखिर मैंने तो कुछ गलत नहीं कहा फिर उसके गुस्सा होने की वजह? होता ये है कि कई ऐसे आदमी आपको मिल जाते जो अपने सिर पर इतना कचरा लिए घूमते हैं जिसका अंदाजा उन्हें खुद नहीं होता.वे किसी अन्य जगह का frustration या tension रूपी कचरा किसी दुसरे पर फेंकने की जुगाड़ में रहते हैं. जिसका ना आपको पता चल पता है की सामने वाला कचरा लिए घूम रहा है. ऐसे झुंझलाने वाले लोगों को भी मालूम नहीं चल पाता कि वे ऐसा रियेक्ट क्यों कर रहे हैं.
कभी कभी तो मेरे व्यवहार में भी गुस्सा के परत देखे जा सकते है. मैंने इस पर चिंतन कर पाया कि हम जब गुस्से में किसी से बात कर रहे होते हैं तो आप की उर्जा तो खपत होती ही है रिश्ते भी ख़राब हो जाते हैं. इस लिए मैं एक ट्रेंड कुत्ता खरीदने चल पड़ा ताकि वो सदा मेरे पास रहे और मुझे याद दिलाता रहे कि भौंकने का काम हम कुत्तों का है आप जैसे नेक आदमी का नहीं. कुत्ता पालने के कई फायदे हैं जो आदमी आप पर भौंके उनपर आप अपने कुत्ता को छोड़ दीजिए उनसे वार्तालाप करने. आप उनपर प्रतिक्रिया ना दे और ना कोई कमेंट, बिल्कुल इसी तरह जिस तरह इस रोचक लेख को पढ़ कर नहीं देने वाले हैं.
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एक सवाल आपके लिए छोड़ रहा हूँ.

पोल से बेदखल होकर भी वो कुत्ता खुश क्यों था?
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मंगलवार, 30 अगस्त 2016

खेल क्रांति और महिला जागृति का नया दौर

“रियो की रानियों को राष्ट्रपति से खेल रत्न” सचमुच ये बहुत गौरव का क्षण है. मैं समझता हूँ कि ये बहुत बड़ा संकेत है खेल क्रांति के आगाज का. रियो की रानियों ने बता दिया है, सिद्ध कर दिया है कि अब खेल आन्दोलन हो कर रहेगा कियोंकि खेल से जुडी हमारे देश और राज्य में जो भी परिस्थितियां और मानसिकता है उससे हमें आजाद होना होगा.पैसों और संसाधनों की कमी हम कतई नहीं झेल सकते और ना ही खेल से कोई समझौता कर सकते हैं. हमें कितना भी रोकना चाहोगे हम नहीं रुकेंगे.हम जी जान से देश के लिए खेलते रहेंगे और भारत में जो मेडलों का सुखा है, बाढ़ ला देंगे. कुछ ऐसे ही ओजपूर्ण प्रेरणादायी बातें उनके आत्मविश्वास और सफलता से झलकती है.
गत सोमवार को खेल दिवस के अवसर पर माननीय राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी ने राष्ट्रीय भवन में चार खिलाडीयों पी वी सिन्धु, साक्षी मलिक,दीपा करमाकर, जीतू राय को देश के सर्वोच्च पुरस्कार राजीव गाँधी खेलरत्न से सम्मानित किया.  इसके अलावा अर्जुन पुरस्कार,द्रोणाचार्य अवार्ड, राष्ट्रीय खेल प्रोत्साहन पुरस्कार और मौलाना अबुल कलाम आजाद ट्रॉफी प्रदान की.
यहाँ गौर करने वाली बातें हैं कि चारों खिलाड़ी जिन्होंने अलग अलग खेल जैसे बैडमिंटन,कुस्ती,जिमनास्टिक,निशानेबाजी में पदक जीत कर हमारे देश का परचम लहराया है. अगर हम इस दशक को महिलाओं का है कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी क्योंकि इसकी जागरूकता तो उसी समय से लगातार बढ़ती जा रही थी जिस वक्त डॉ प्रतिभा पाटिल राष्ट्रपति बनी थीं. पंचायत चुनाव में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी,खासकर बिहार में छात्राओं को पढाई और खेल में प्रोत्साहन के लिए साइकिल और लैपटॉप वितरण किए गए. जिसके दूरगामी परिणाम को देखते हुए ऐसे कई काम किए गए.मेट्रिक की परीक्षा में छात्रों की अपेक्षा छात्राओं ने उम्मीद से ज्यादा अच्छा अंक प्राप्त किए.राज्य और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी कई क्षेत्रों में जैसे 18 जून 2016 को IAF प्रथम महिला फाइटर के पद पर अवनी, भावना और मोहना का नियुक्त होना. अगर फिल्मों की बात करें तो अब फ़िल्मकार महिला प्रधान फिल्म निर्माण करने में जोखिम उठाने से नहीं डरते. यही कारण है पिछले कुछ समय से कई फ़िल्में रिलीज़ हुई जो विशेष रूप से मुख्य पात्र के रूप में नायिका हैं. उन फिल्मों की लिस्ट में कुछ नाम इस प्रकार हैं- मेरिकोम, कांची, कहानी, बाजीराव मस्तानी,सुल्तान, दृश्यम,पिकू, NH10, तनु वेड्स मनु, मसान, नीरजा,एंग्री इंडियन गॉडेस और आने वाली फ़िल्में अकिरा और दंगल. ये सभी ऐसी फ़िल्में हैं जिसमें महिलाओं के के किरदार प्रतिनिधित्व का जयघोष करते हैं. चेतन भगत की नई किताब जो आने वाली है वह भी महिला के सशक्तिकरण का नया चहेरा दिखने वाला होगा.
इस लेख के अंत में मैं उन तमाम खेल कोच को सलाम करता हूँ जिन्होंने तमाम कठिनाइयों को कुचलते हुए खिलाड़ियों की एक नई पौध तैयार कर रहे हैं जिसकी हल्की सी कोपलें दिखाई देने लगी है. मुझे अभी भी पुलेला गोपीचंद और पी.वी. सिन्धु का  इंटरव्यू याद है जो 8- 9 माह पहले अखबारों में छपा था.पढ़ कर आश्चर्य और गर्व का अनुभव हुआ था यह जान कर कि वे कितने परिश्रम करते हैं कैसे प्रैक्टिस करते हैं, और उस दौरान किन किन समस्याओं से गुजरना पड़ता है. उनकी मेहनत रंग लायी फिर भी अभी बहुत कुछ किया जाना बांकी है. और भी कई खेल हैं. जिसमें अधिक से अधिक खिलाड़ियों को विश्वस्तरीय प्रशिक्षण एवं सुविधाएँ दिए जाने की जरुरत है.

-   --- अभिषेक कुमार



सोमवार, 29 अगस्त 2016

फिल्मों की बातें-मोहेनजोदरो.



मोहेनजोदरो.इस फिल्म के बारें में उसी वक्त कहना चाह रहा था जब देखा था.release के एक दिन बाद ही. पर फुर्सत मिले तब तो. मुझे तो बहुत अच्छी लगी थी. आपको? बहुत दिनों के बाद कोई ऐसी फिल्म देखने को मिला जो एक अलग दुनिया में ले चले. कुछ ऐसी बातों से रूबरू करें ऐसी फिल्म बहुत कम होती है.इस फिल्म हर एक चीज जैसे- कलाकारों का चयन(हृतिक रोसन, पूजा हेगरे),उनकी अदाकारी, डांस और संवाद बहुत ही सुन्दर था.अगर पूजा हेगरे की जगह की फेमस अभिनेत्री को लिया जाता तो शायद उतना इफेक्टिव नहीं लगता जितना एक नए चेहरे की महत्ता लगती है. नायिका की जो गेटअप है कोउस्तुम है वो काफी ध्यान आकर्षित करता है.फिल्म के संगीत और गाने तो बेहद ही रूमानी है. इनके गीतों में एक तरफ उनके उस समय के शहर का गुणगान है, तो दूसरी तरफ सिन्धु नदी की पूजा प्रार्थना की गई है. और एक रोमांटिक गीत भी है जिसे शब्द(बोल) बड़े प्यारे हैं.

पास आके भी क्यों मौन है तू,

ये तो कह दे मेरी कौन है तू.
बोलते हैं नयन मौन हूँ मैं,
अपने नैनों से सुन कौन हूँ मैं.
लोकेशन और साज सज्जा पर काफी काम किया गया है. दरअसल इस फिल्म के निर्देशक आसुतोष गोवरीकर ने बहुत ही रिसर्च कर एपिक-एडवेंचर रोमांटिक फिल्म का रूप दिया है. ये बहुत बड़ी सफलता है जिसे नीरस dacumantary फिल्म जैसा नहीं होने दिया. पर कमाई में ये फिल्म कोई कीर्तिमान स्थापित नहीं कर पाई. पर मेरा ये मानना है कि सिर्फ पैसे से किसी की गुवात्ता मापना ठीक नहीं.  
ये बड़ी फिल्म है.इसका दायरा विशाल है. और इस फिल्म में ar रहमान ने जो संगीत दिया वो अद्भुत है. किसी भी फिल्म की रूह संगीत होती है बैकग्राउंड म्यूजिक होती है. हमारे डेली लाइफ में यही तो कमी रह जाती है की यहाँ कोई बैकग्राउंड म्यूजिक नहीं होता. खैर,
इस फिल्म की कहानी की बात करें तो एक लाइन में ये एक साहसी युवा सरमन की कहानी है जो एक छोटे से गावं अमरी से मोहनजोदड़ो व्यापार करने जाता है. वहां वह लालची और अत्याचारी शासकों के कुकृत्यों से अवगत होता है, जहाँ वो क्रोधित हो जाता है और लौटने का निर्णय करता है पर वही कुछ वैसा ही होता है जो हर एक फिल्म में होता आया है और होता रहेगा, कहने का मतलब आप समझ ही गए होंगे सरमन को एक सुन्दर सी चानी नामक लड़की से प्यार हो जाता है. और वो इस पाने के लिए मोंजा (वहां का होने वाला शासक और चानी का होने वाला पति) से लड़ता है. उस वक्त कहानी और दिलचस्प मोड़ लेलेती है जब सरमन पता चलता है उसके पूर्वज
मोहनजोदड़ो के शासक थे तो ये लड़ाई और बड़ी हो जाती. पूरी जनता का सरमन प्रतिनिधि बन जाता है और वो इस अत्याचारी शासक से उन्हें मुक्ति दिलने का संकल्प लेता है. वही दूसरी ओर एक और प्राकृतिक आपदा का सन्देश मिल जाता है की जो बांध सिन्धु नदी पर सोने के लालच में बनाई गई है वह ध्वस्त होने वाला है.
फिर पूरा शहर खाली कराया गया, नाव का पुल बना कर सारी जनता की रक्षा हुई पर मोहेंन्जोदारो पूरा शहर सदा के लिए जमींदोज हो गया.इस प्रकार मोहें जोदारो सोशल स्ट्रक्चर और सिस्टम, जजमेंट  और रूल्स प्रथा और परंपरा, आस्था और अन्धविश्वाश, साहस और पराक्रम, प्रकृति और जलवायु के बारें में बात करती है. एक और बात जो मुझे निजी तौर पर आकर्षित करती जो स्वप्न और कल्पना की बातें है.बखूबी देखने को मिली.

अगर आपने देखा है तो बहुत अच्छा और नहीं देखा तो जरुर देखिए. और मेरी बातें आपको कैसी लगी जरुर बताएं. 

शनिवार, 27 अगस्त 2016

बाढ़ और सुखाड़ के बीच गुफ्तगू

“बाढ़ के साथ 166 प्रखंडों में सुखाड़” बड़े और मोटे अक्षरों में हिंदुस्तान दैनिक के फर्स्ट पेज पर छपे उक्त हेडिंग लाइन पढ़ कर ना जाने कितने सवाल मन मस्तिष्क में कोंधने लगे.तस्वीरों को देख कर काफी हैरानी हुई. आंकड़ो ने झकझोर कर रख दिया. सोचिए जरा जो इस विकट परिस्तिथियों का सामना कर रहे है उन पर क्या बीतती होगी.सबसे पहले मौजूदा हालात से उपजे कुछ सवाल – बाढ़ और सुखाड़ के लिए कौन जिम्मेवार है? कब निजात पायेगा बिहार ऐसे हालत से? बदतर हालत कब होंगे बेहतर? बाढ़ की विभीषिका और सुखाड़ की समस्या का क्या कोई ठोस समाधान संभव है? क्या ये एक तरह की लापरवाही है या हमारे पास कोई चारा नहीं है आपदाओं को झेलने के सिवा? आपदा प्रबंधन विभाग या उससे जुड़े विभाग के पास कोई योजना है जिससे जनता को राहत मिल सके? या फिर ये हालात सरकार के नाकामयाबी का संकेत है?  ऐसे सवाल किसी को भी हिलाने के, सोचने के लिए पर्याप्त है. आप की क्या राय है?

(आगे पढ़ने से पहले ये मान लें कि आप किसी चाय के ढाबे पर चाय का इंतजार कर रहे है और पास में बैठे एक ग्रुप में गुफ़्तगू चल रही. जिसे आप सहज रूप से सुन पा रहे हैं.)

“भाई! सब लोग पलायन करने के लिए विवश हैं.उनकी जान जोखिम में होने की वजह से वे डरे हुए है.जो कुछ उन्हें अपने बचाव के उपाय सूझ रहे हैं वे कर रहे हैं. अखबारों और सोशल साइट्स पर ऐसे तमाम तस्वीर मिल जायेंगे जो बाढ़- सुखा की विभीषिका को बयां कर रहे हैं. मुझे लगता है बिहार ऐसी विभिषिका झेलने के लिए अभिसप्त तो नहीं.”

“नहीं महाराज. कैसी बात करते हैं. आप द्वापरयुग में तो नहीं जी रहे हैं. दो दी पहले ही जन्माष्टमी मनायी उसी का प्रभाव है आप पर.”

“नहीं.नहीं. आप ही बताए कि ये कैसे हुआ अचानक ?. और सुनकर भी कितना अजीब लगता है. बिहार में बाढ़ भी  और सुखाड़ भी. ये तो वही बात हो गई रात भी है और सूरज भी उगा है. ये भगवान की ही तो लीला है.वे तो कुछ भी कर सकते हैं.”

“कम कम से भगवान पर तो दोष मत दीजिए. ये बाढ़ कि वजह तो पड़ोसी देश नेपाल और पडोशी राज्यों से आये पानी के कारण हुई और कुछ इलाकों में 18 फीसदी कम बारिश होने से ऐसे हालात हुए हैं.”

“ओह. तो ये बात है. मैं तो खामखाँ भगवान को दोष दे रहा था. अच्छा तो ये बताए कि क्या बाढ़ और सुखा की कहानी क्यों दुहराई जा रही है? इसमें किसका दोष है सरकार का या अखवार वालों का?”

“मुझे तो बिल्कुल भी कोई दोषी नज़र नहीं आता. क्युकि सरकार की घोषणा, अनुशंसा,रिपोर्ट,सर्वेक्षण,परिचर्चा,बैठक, प्रस्ताव,ज्ञापन, निर्देशन आदि इत्यादि तो कर ही रही है.हमारे अफसर जमीनी करवाई को छोड़ कर कागज़ी घोड़े दौड़ाने के अभ्यस्त तो हैं ही.अखवार वाले का तो कोई दोष नहीं,ये तो पढ़ने वाले के यादास्त का मामला है.वे जो पढ़ते हैं और शायद सोचते भी हैं कि ये तो पिछले साल वाली घटनाओं का ब्यौरा है सिर्फ डेट चेंज है.”

“आपने ठीक कहा. देखिए आपदा प्रबंधन की बैठक हुई है.साथ ही बिहार ने केंद्र सरकार से सहायता के लिए भी गुहार लगाई है.”

“हाँ. ठीक है पर एक बात समझ में नहीं आता कि हम जानते हैं बाढ़ और सुखाड़ की समस्या साल दर साल भयावह रूप धारण कर रही है. खास कर धान रोपाई के समय. कहीं फसल डूब जाती है तो कहीं सुख जाती है.अब तो जान पर भी आफत है. आखिर साल भर जनता के प्रतिनिधि mla और mp व प्रशासन क्या करती है?क्या उन्हें पता नहीं चलता या खबर लेने की कोशिश नहीं करते कि कौन सा पुल बांध कमजोर है? कहाँ का रेलखंड क्षतिग्रस्त है या होने वाला है.मौसम की भविष्यवाणी के लिए कोई जागरूक है भी की सब राम भरोसे?”

“दरअसल बात है कि हमारी आदत है कि जब  प्यास लगेगा तभी कुआँ खोदेंगे. और हाँ अब तो और आफत है खोदने से भी कहाँ मिलेगा एक तरफ ग्लोबल वार्मिग बढ़ रहा है तो दूसरी तरफ जल के लेयर्स घटते जा रहे हैं.”

(अब आपके सामने चाय प्रस्तुत है. चाय के मजे के साथ उनकी बातों पर गौर करना ना भूलें)

“भाई! जो हुआ सो हुआ. अब जो हो रहा है हमारा ध्यान उसपर होना चाहिए. हमें सोचना चाहिए कि किस प्रकार हम बाढ़ और सुखा पीड़ितों की मदद कर सकते है?सुखा से निपटने के लिए तो लम्बी अवधि के कार्यक्रम बनाने की जरुरत है. किन्तु बाढ़ के कारण जो समस्या पैदा हुई है उसे तत्काल समाधान करना होगा. अगर ऐसा नहीं हुआ तो जान माल को काफ़ी नुकसान होगा.”

“नुकसान! जरुर होगा और होकर रहेगा.ये होना ही चाहिए और जो हो रहा है वो पहले से सुनिश्चित है.”

“आप कैसी बात कर रहे हैं.आप को उन पीड़ितों के प्रति कोई हमदर्दी नहीं.”

“हाँ.मुझे कोई हमदर्दी नहीं.जरा आप ही बताए कि आप कितने सहिष्णु हैं? आप कितने दयावान हैं ?”

“ये क्या.भाई! आप तो मुझसे लड़ाई करने लगे.”

“नहीं, नहीं, भाई साब! मैं आप से क्यों लडूंगा. मैं तो दरअसल ये कहना चाह रहा हूँ कि जब हम लोगों ने वृक्षों और जलवायु के प्रति कोई हमदर्दी नहीं दिखाई तो प्रकृति को हमलोगों के प्रति कितनी हमदर्दी होगी.जब उसपर हमने अत्याचार किया है तो वह हमपर कहर बरसायेगी ही.कभी बाढ़ का रूप लेकर.कभी सुखा की विभीषिका बनकर.”

“हम्म्म्म. हमें जो है ना. समाज में एक नै क्रांति लानी होगी. जलवायु परिवर्तन के प्रति हम सभी लोगों को जागरूक होना होगा.”

“हाँ. हुई थी ना दो दिवसीय बैठक.भारतीय कृषि अनुसन्धान परिसद के संरक्षण में.”

(शायद आपकी चाय ख़त्म हो गई होगी और जाने को सोच रहे होगें पर बात तो पूरी सुन लीजिए)

“मत कीजिए चर्चा इस बारें में. चर्चा- परिचर्चा करते करते टीवी वालों ने दिमाग का दही कर दिया है. मैं पुछता हूँ कहाँ थे भाई अबतक. क्या कर रहे थे.कभी आप सबने जमीनी स्तर पर आकर देखा सुना कि वास्तव में क्या परेशानी है.बहुत आसान है ac हॉल में जो जी आये बोल दिया.हंशी मजाक और बेकार बहस पर जाया करना. बहुत आसान है. सिंचाई, बिज, उर्बरक आदि मामले में किसानों को क्या क्या समस्या झेलनी पड़ती है.इन बातो में कहाँ किसी को रूचि है?,उन्हें इंटरेस्ट तो अपनी झूठी प्रसंशा करने में होता है?. उन्हें अपने ऑफिस की राजनीति में ज्यादा मजा आता है.वो परेशान हैं कि उन्हें क्यों पदोन्नति चाहिए या फिर किसानों के समस्या को किस तरह हल किया जाये. खैर वो प्लाट पर जाने से तो शायद इसलिए भी डरते हैं कि गाँव जाने वाले जितने भी रास्ते है वहां रास्ते तय नहीं करने होते है बल्कि गड्ढे और खाई से गुजरना पड़ता है.जिसे वे झेलना नहीं चाहते.तो जाएँ भी तो कैसे?”
“मैं इस बात से सहमत हूँ. यहाँ कौन ऐसा आदमी होगा जो अपनी सलामती नहीं चाहता है.भला कौन जाये अपनी हड्डी पसली तोडवाने.इस बात पर आपको यकीन ना हो तो आप खुद आजमा सकते हैं.कुछ को छोड़ कर बिहार के किसी भी जिला के 40-50 km दूर गाँव चले जाइए.शरीर के सारे पुर्जे खुल जायेंगे.  इतना कुछ झेल ने बाबजुद ग्रामीण इलाकों में इन दिनों कहर टूट पड़ा है.शायद रोड ठीक रहता तो राहत सामग्री पहुँचाने में मदद मिलती. जिले के कई जगह तेज हवा और वर्षा की वजह से पेड़ के उखड़ने व झोपड़ियों के उजड़ने की घटनाओं से सब हलकान महसूस कर रहे है.आवागमन तो बाधित है ही, बिजली आपूर्ति भी प्रभावित हो गई है.”
“वैसे कुछ संगठन और ग्रुप के लोग बाढ़ पीड़ितों की सहायता के लिए आगे आये हैं इतने मात्र से काम नहीं चलेगा. आपको, हमको और सबको आगे आना होगा और सब मिलकर जो भी मौजूदा व संभावित समस्याएं उनके समाधान के लिए हाथ बंटाना पड़ेगा. कुछ नहीं तो आत्म संतुष्टि के लिए जरुर. साथ ही साथ मदर टेरेसा (जन्म दिन August 26, 1910) को याद करते हुए.”



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रविवार, 10 अप्रैल 2016

बिहार में शराब बन्दी पर चर्चा

दो हफ्ते से शराब बन्दी को लेकर अखबार,टीवीचैनल और सोशल साईट पर जोरो से चर्चा हो रही है. गल्ली-मुहल्ला ,चौक-चौराहा, सड़क,संसद ,गाँव,शहर ,बस्ती ,कोई ऐसी जगह नहीं जहाँ शराब बन्दी की बातें नहीं हो रही है. जितने लोग उतनी तरह की बातें और हो भी क्यों ना...! कुछ बातें तो होनी ही थीं और फिर होती ही रहती है.यहाँ तो गप्पे हो रही है .
   कई तरह की बातें,कहीं गरम कहीं नरम, तो कोई पॉजिटिव तो कोई नकारात्मक तर्क दिए जा रहा हैं.कोई शराब बन्दी से खुश है, तो कोई बौखलाए हुए हैं. कोई सरकार की तारीफ में मगन है, तो कोई सरकार के खिलाफ नारेबाजी कर रहा है. जो भी हो, उन्हें दो भागो में बांट सकते हैं. शराब बन्दी के पहले की बाते और शराब बन्दी का कानून लागू होने के बाद की बातें. इन तमाम तरह की खबरों में बातें कम शिकायतें और शरारतें ज्यादा उभर कर सामने आ रहे हैं. मैं शिकायतओं और शरारतों के मुगलातों से हटकर शराब बन्दी होने से लोगो पर क्या असर हुआ है. उन पर बात करना चाहता हूँ क्योंकि ये ऐसा असर है, जिसकी कल्पनाएँ शायद सरकार चलाने वालों ने भी नहीं सोची होगी.
      हर दिन सुनने को मिल रहा है,फलां जगह शराब पीने से दो युवक की मौत हो गई. शराब की कमी कारण कई शराबियों के हाथ-पैर सुन्न हो गए हैं. ना जाने कितने शराब-प्रेमियों को पागलखानों में भर्ती करवाना पड़ रहा है. हद तो तब हो गई जब मैंने ये सुना की शराब के कुछ शौक़ीन इस नशे के को खोज रहे हैं. जो इनकी नशे को पूरा करे .इस खोज में वो कभी फिनायल ,कभी साबुन तो कभी पोलिश क्रीम को अपना निशाना बनाया,....!पर इन्हें जब संतुष्टि नहीं मिली तो बाबा रामदेव प्रोडक्ट्स स्टोर पर कोई नशीली हर्बल शैम्पू की डिमांड कर डाला. शायद वे अब भी उसी पूरक के अनुसंधान में लगे होंगे. शायद अपने सुना होगा की “ना मामू से काना मामू अच्छा” . इसी सोच के तहत ताड़ी बेचने वालो के पास शराबीयों की संख्या बढ़ गई है. भूल बस मीडिया वाले भी वहाँ पहुँच गए और अगले दिन ही ताड़ी वालों के नाम वायरल हो गया.परिणाम स्वरुप ताड़ी स्टॉक पर भी ताला लटक गया.
           अब जरा आइए सोशल साईट पर,पहले वातसप्प पर चलते है....,यहाँ कई तरह के आपको विडियो ,चुटकुले मिल जांयेंगे .जिससे शराब बन्दी किस तरह से सबके सिर पर हावी है, पता चल जायेगा. कई ऐसे फोटो भी वायरल है,जंहा रोड-रोलर से शराब से भरी बोतल को नष्ट किया जा रहे हैं. शराब की बोतल की अर्थी निकली जा रही है,पर यह जानकर बड़ी हैरानी हुई कि शराब बेचने वाले whatsapp के जरिये शराब ज्यादा कीमत पर होम डिलीवरी की सेवा उपलब्ध करने के तैयारी में लगे हुए हैं. मनुष्य की प्रकृति रही है कि वह नकारात्मक चीजों की ओर जल्दी खिंचा चला जाता है.जिस चीजों की उसे मनाही के आदेश या सलाह दिए जाए वह उसी चीजों को करने की जिद करता है. अब इस जड़ में जीत किसकी होती है..?ये देखने वाली बात है. शराबीयों की या प्रशासन की! वैसे पिछले दिनों ही प्रशासन पर ऊँगली उठाई गए थे की प्रशासन के लोग भी शराब पीने के आदी होते है.तो दुसरे दिन ही पूरे प्रशासन और पुलिस महकमे में शराब ना पीने का संकल्प लेकर अपनी स्वच्छ निष्ठा का प्रमाण प्रस्तुत किया. किन्तु डर तो ये अब भी है की जैसे पिज़्ज़ा बॉय होम डिलीवरी करने में एक्सपर्ट होते हैं  ,कहीं उसी तरह शराब डिलीवरी करने वाले भी ना बन जाये क्योंकि इन सब लडकों को पता है कि ट्रैफिक रूल ब्रेक करने की समस्या का समाधान 10 से100 रुपया में हो जाता है. वैसे ही शराब ढ़ोने के लिए ट्रैफिक पुलिस के जेब में छोटा बोतल डाल दिया तो समझो सारी मुश्किलों से छुटकारा जा.फेसबुक ट्विटर पर भी बहुत सारे प्रशंसा के स्वर गूंज रहे हैं. शराब बन्दी को तो कोई अनुकरणीय बता रहा है. कोई आम जनता को सलाम कर रहा है तो कोई महिलाओं के जोर-शोर से इस आन्दोलन में जुटने के लिए आभार व्यक्त कर रहा है.
        पिछले शाम को मैं मार्केट में कुछ सामान खरीदने के लिए मोलभाव कर रहा था ,कि एक मित्र से मुलाकात हो गया, उन्होंने मुझे छेड़ते हुए कहा कि सब तुम ही खरीद लोगे कि मेरे लिए भी खुछ रहने दोगे.मैं तुरंत ही उनके ओर मुखातिब हो कर हँसते हुए बोला की महाराज...!जेब में पैसे रहेंगे तब तो खरीदूंगा ना, मार्केट तो मोल-भाव के शौक को पूरा करने चला आता हूँ. फिर दो तीन लोग और मिल गए और शुरू हो गए शराब बन्दी को लेकर खींचातानी .उन्हीं में से एक भाई साहब, वेश-भूषा से पढ़े-लिखे और शक्ल से होशियार भी दिख रहे थे. उनका कहना था की जो आप लोग शराब बन्दी को लेकर इतना शोर मचा रहे हैं,ये कुछ नहीं है. सरकार जनता के आँखों में धूल झोकने का काम कर रही है. ऐसे कई तरह के कानून आये और कई गए, कोई पालन होता है क्या? “चार दिन की चांदनी फिर अँधेरी रात” बस दो दिन रुक और जायिए. सब दुकान खुल जाएँगे. तब सरकार के नाम का भजन जपते रहिएगा.बीच में किसी ने उन्हें टोकते हुए कहा, क्या सरकार को शराब से फायदा नहीं पहुँचता था? फिर दुसरे प्रतिद्वंदी ने मोर्चा सम्हाला. महाराज...,शराब ही क्यों, जितनी भी नशीली चीज़ हैं, तम्बाकू, खैनी ,गुटखा सब पर जो टैक्स आता है, उसका आप अनुमान भी नहीं लगा सकते है, और बात करते हैं.....! सरकार सिर्फ ढोंग रचा रही है,इस ढोंग का पर्दाफाश होने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा. इधर ही देख लीजिए ऐलान किया गया था, कि  शराब पर पूरी तरह से रोक लगा दिया गया है, इसका कानून भी पास हो गया है,लेकिन दूसरे ही दिन शराब विक्रताओ की संविदा पर बहाली की नोटिस निकल आया. इतनी बातें सुनते ही दुसरे लोग भी फार्म में आ गए और शुरू हो गए. देखिए...! देखिए जरा कोर्ट कहचरी में जाकर क्या हालत है. सरकार उस तरफ ध्यान तक नहीं देंगी, जहाँ हजारो-लाखो केस बीस सालों से अधर में लटके हैं. सरकार अधूरे पुल-पुलिया,सड़क,रेल जैसे महत्वपूर्ण काम पर ध्यान नहीं देंगी. हजारो-हज़ार मजदूर का पलायन हो रहा है. दुसरे राज्य जाने की विवसता सरकार के समझ से परे है. कोई स्कूल, कॉलेज की स्थिति ठीक नहीं है, सारी शिक्षा व्यवस्था चौपट है? सरकार को तो बस इस तरह के शराब बन्दी से मिल रही प्रशंसा से फूली नहीं शमां रही है. केंद्र सरकार के आरोप प्रत्यारोप से लगी अपनी मुस्कराते हुऐ तस्वीरों को अखबारों में देखकर मगन हो रहे है.इस आत्ममुग्धता से किसी भी सरकार को बचकर रहना चाहिए! तीसरे भाई साहब से भी नहीं रहा गया. वे भी अपनी लम्बे-चौरे,कद-काठी और एक्स्ट्रा बजन वाले शरीर को लिए हांफते हुए स्वर में बड़ी मजबूत किन्तु विरोध पूर्ण बातें कहीं. उनका कहना था, ये चौक देख रहे है ना, पहले यहाँ देर रात तक महफिल लगी रहती थी. लोगों का यंहा आना-जाना लगा रहता था.  किन्तु अब 6-7 बजते ही सारा बाज़ार वीरान-सा लगने लगता है. पहले मार्केट में चहल-पहल बनी रहती थी. बाज़ार में ऐसा लगता है,की मंदी छा गई है.मीट-मछली की दुकान हो या होटल सब मजे में थे. बिक्री सीधे डाउन हो गई. झाल-मुढ़ी ,कचहरी-छोले वाले से पूछो, तो कहेगा की शराब बन्दी ने वाट लगा दी है, भाई मेरे ....!अब बिसलेरी या केनले जैसी ब्रांडेड वाटर की खपत काम हो गई है. भाई शराब के साथ चखना- पानी चाहिए की नहीं...! हम तो कहते है की जिसको पीना है वो पिए जिसको नहीं पीना है वो नहीं पिए इसमें कम से कम सरकार को तो नहीं आना चाहिए था.....!
   इतने में माहौल इतना गरम हो चूका था की मैंने टॉपिक चेंज करने की चेष्टा की किन्तु असफल रहा. मैंने भीषण गरमी के इस मौसम में कहा, बिजली की कटौती कब तक जरी रहेगी. दूसरे भाई ने चुटकी लेते हुए कहा जब तक बिहार में बिजली की चोरी जारी रहेगी .पर वो भाई साहब शराब बन्दी को ही तुल दिए जा रहे थे.रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे.
    एक मिनट भाई साहब! मैंने अपनी जेब स्मार्ट-फ़ोन निकलते हुए हेलो कहा. उन्होंने कहा, कॉल है! बीबी का होगा!(हँसते हुए).चलता हूँ भाई मिलते है अगले दिन कहकर मैं वहाँ से खिसक गया. पर जैसे ही फ़ोन का स्क्रीन ऑन किया तो मुस्कराए बिना ना रह सका. वाटसप पर जो शराब बन्दी का एक मेसेज शो कर रहा था.

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पनामा लिक्स के बहाने अपनी बात

पनामा लिक्स ने जो काले धन का सनसनीखेज खुलासा किया है. इसमें जो भी नाम सामने आये हैं वे बेहद चौकाने वाले है.इससे तो यही स्पष्ट होता है.जितने लोग पैसों के ढेर पर हैं, वे कहीं  ना कहीं धोखाधडी – जालसाजी और दूसरे गलत तरीके से आम आदमी का हक़ मरते रहे है. उनके खून चूसते है. आम आदमी ठीक इसके विपरीत व्यवहार कर रहे है. वे उन  तमाम शक्सियत को शोहरतों के सिंहासन पर बैठे देखना चाहते है. वे उनसे प्यार और सम्मान करते हैं, क्योंकि आम लोगों को शायद पता नहीं चलता की वास्तिविकता क्या है,हमारे सिस्टम में क्या हो रहा? इसके कई कारण हो सकते हैं. बहुत सारे लोगो को लोकतंत्र या राजनीति में जागरूकता की कमी है. जागरूकता के कमी दो कारण है.पहला जो लोग अशिक्षित है, वे जानने-समझने की चेष्टा नहीं करते है, वे बस दो वक्त की रोजी-रोटी कमाने तक ही सोच सोच पाते है. वे जानते है कि हम गरीब है और गरीब ही रहेंगे. दूसरा जों वर्ग पढ़ा-लिखा है, वो भी भली-भांति जानते हैं लोकतंत्र में कहाँ, क्या हो रहा है,कहाँ धांधली हो रही है. पर ये वर्ग ना मुंह खोलते हैं,ना सामने आते हैं. रेडियो, टीवी देख लिए बस काम ख़तम. ऐसे लोग ये सोचकर चलते है,कि हमारे सोचने और कहने पर क्या फर्क पड़ता है, हम वोट भी जिसे देंगे उसकी तो सरकार बनने वाली नहीं क्योंकि पढ़े-लिखे और जागरूक लोगों से कही अधिक जनसँख्या गरीब और अशिक्षितों की है. जो पिछड़े लोग हैं,जो जाती-पति के नाम पर बाँट दिए गए है.वे बेबस है,उनलोगों को वोट देनेके लिए जो अपनी प्रसिद्धि का झूठे प्रचार का सहारा  लिया. पिछड़े तबके जो राजनीति के दांव-पेंच से कोशो दूर हैं,वे नहीं जानते की ये हवा स्वच्छ छवि वालों ने फैलाई है, इस षड्यंत्र के पीछे छिपे जब अपने नेताओं के बारे में उन्हें ठीक से पता नहीं है,कि वे कितना पढ़े लिखे हैं, कितनी बार जेल गए हैं, उनपर कितने मुकदमे चल रहे हैं, उन्होंने क्या-क्या समाज-सेवा किए हैं ?
       पनामा लिक्स क्या है? इस बारे में ज्यादातर लोगों को क्या और कितना मालूम होगा?वैसे भी हमें टीवी
चैनल वालों की फिजूल की बहस सुनने से फुरसत मिले, तब तो वे ज्वलंत मुद्दा उठाएँगे. कभी-कभी गंभीर विषयों की चर्चा सामने होती भी तो ना जाने कब ट्रैक चेंज हो जाये, उन महाराथियो का पता नहीं. अंततोगत्वा समय बर्बादी के अलावे परिणाम कुछ भी नहीं निकलता है. अब हममें से ज्यादातर लोग जो कभी-कभी
अख़बार पलट लेते हैं, तो ना जाने कितने सारे सवाल सिर पार मंडराने लगते है? जैसे क्या पनामा लिक्स ने जो दावे किये है,क्या पूरी तरह वे सच हैं ? पनामा लिक्स कौन सी संस्थान के दवरा संचालित होता है, इस अनुसन्धान में कौन-कौन से लोग जुड़े हुए हैं. ऐसे सवाल इसलिए नहीं कि हमें उनके दावे पर शक है.इसलिए अनुसन्धान के बाद उन्हें धन्यवाद दिया जा सके और उन्हें और इसी तरह के अनुसधान भविष्य में भी जारी रखे. उन्हें इस महान कार्य के लिए सभी आम जनता की तरफ से आभार प्रकट किया जाये.
     मान लिया जाये कि पनामा लिक्स के दावे झूठे हुए तो भी कोई हानि की गुंजाइश नहीं. क्योंकि इसी बहाने तो कम से कम हमारे देश में काले धन व भ्रस्टाचार का दिखावी अनुसन्धान तो होगा. कुछ लापरवाही और गैरजिम्मेदारी के हालत में सजगता और जागरूकता लाने में मदद तो मिलेगे ..
         क्या हमारे देश में कभी काले धन वापस आ पाएंगे? क्या अभी जो भ्रष्टाचार हो रहे हैं, जो आम लोगों का नुकसान हो रहा है,क्या उसका भरपाई कभी हो पायगी. बीच में तो लोकपाल को लेकर भी काफी हो-हल्ला हुआ था. इस हल्ले में कुछ ने अपना पल्ला झाड़ लिया,तो किसी ने शोहरत बटोर लिया. पर आम जनता वहीँ की वहीँ. ना तो विकास हुआ ना काला धन वापस. ऊपर रोज़ की मारा-मारी, कही वे पुल गिरने से दब रहे हैं, तो कहीं घरों और फसलों में आग लगने से मर रहे हैं.
    आखिर कहाँ हमारी व्यवस्था में कमी है, इसके लिए कौन जिम्मेदार है? विकसित राष्ट्र का जो सपने सदियों से देखते आये है,क्या हम उसके लिए तैयार है? क्या कोई हमने रोडमैप बनाया है,कोई ऐसी व्यवस्था है जो ट्रांसपरेंसी को कायम रख पाए? शायद इसका जवाब नहीं! इन सबके  मूल में एक ही चीज़ है, वह है स्वच्छ लीडर और  स्पस्ट लक्ष्य की कमी .जितनी जल्दी हो सके हम सही नेता चुने या सही नेता बने .......!


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शुक्रवार, 18 मार्च 2016

कुछ ही दिनों बाद होली है.इसी बहाने कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत है. जिन्हें हिन्दी से प्यार है, कविता से लगाव है. होली का इंतजार है तो जरुर पढ़िए. अगर पसंद आये तो मुस्कुरा कर like पर क्लिक करना ना भूलिए.

होली खेलो
तन,मन और सारा जीवन,
आज तुम,सारे जहाँ को रंग डालो.
ये त्योहार है कितना पावन,
भर भर कर, पिचकारी; होली खेलो .

जो पल गुजरा, उसका ना मलाल करो,
दिखे जो खाली चहेरा, झट से उसे गुलाल लगा दो.
दुश्मन को गले लगा कर, अपना दोस्त बना लो,
बच्चे-बूढ़े, युवक-युवती सब मिलकर; होली खेलो.

खाओ और खिलाओ, पुआ या पकवान,
गाओ और बजाओ , झाल या मृदंग.
मस्ती के माहोल में, खुशिओं से झोली भर लो,
क्या परिवार, क्या पड़ोसी सबके संग; होली खेलो.

बचा ना पाओगे रंगों से,
खुद को चाहे कितना भी बचा लो.
थिरक रहे हैं, झूम रहे हैं लोग सारे.
और कह रहे हैं, होली खेलो.

ईर्ष्या, द्वेष और जो भी गन्दे विचार,
सारे को तुम आग लगा दो.
ये बादल रंगीन, धानी धरती रहे गुलजार,
यदि मैं और तुम एक बाग लगा दो.

इस पर्व का यही सन्देश लिए,
हर्षोल्लास के साथ; होली खेलो.

-  अभिषेक कुमार
                                                                             

C-7a: Pedagogy of social science [ B.Ed First Year ]

1. माध्यमिक स्तर पर पढ़ाने के लिए आपके द्वारा चुने गए विषय का क्षेत्र क्या है ? उदाहरण सहित व्याख्या करें। माध्यमिक स्तर पर पढ़ाने के लिए हम...